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अरूणिमा सिंह,भोपाल: जमुई में नाबालिगों से कथित बदसलूकी और उसका वीडियो वायरल होने के बाद ‘मोरल पुलिसिंग’ को लेकर बहस तेज हो गई है। जानिए क्या है मोरल पुलिसिंग, क्या इसे कानून में मान्यता मिली है और इससे संविधान के किन मौलिक अधिकारों पर असर पड़ सकता है।बिहार के जमुई में 19 सितंबर को दो नाबालिगों के साथ कथित बदसलूकी और यौन उत्पीड़न का मामला सामने आने के बाद ‘मोरल पुलिसिंग’ एक बार फिर चर्चा में है। सोशल मीडिया पर घटना का वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच शुरू की। पुलिस के मुताबिक, मामले में पॉक्सो एक्ट और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है। मामले की जांच के लिए एसआईटी भी गठित की गई और आरोपियों की पहचान कर कार्रवाई की जा रही है।मामला तब और चर्चा में आया जब घटना को लेकर बिहार की खेल मंत्री और जमुई की विधायक श्रेयसी सिंह की ‘मोरल पुलिसिंग’ पर की गई टिप्पणी सामने आई। उनके बयान के एक हिस्से में मोरल पुलिसिंग को ‘सलीके और शालीन तरीके’ से किए जाने की बात कही गई, जिसके बाद विवाद शुरू हो गया। बाद में श्रेयसी सिंह ने सफाई देते हुए कहा कि उनकी बात को संदर्भ से हटाकर पेश किया गया और पूरी बातचीत को सामने नहीं रखा गया। उन्होंने यह भी कहा कि घटना में शामिल असामाजिक तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।लेकिन इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है—आखिर मोरल पुलिसिंग क्या है और क्या किसी व्यक्ति या समूह को दूसरों की नैतिकता तय करने का अधिकार है?

क्या होती है ‘मोरल पुलिसिंग’?

‘मोरल पुलिसिंग’ कोई अलग कानूनी अधिकार या सरकारी व्यवस्था नहीं है। आम तौर पर इस शब्द का इस्तेमाल तब किया जाता है, जब कोई व्यक्ति या समूह अपनी नैतिक, सामाजिक, धार्मिक या सांस्कृतिक सोच को दूसरे लोगों पर थोपने की कोशिश करता है।किसी के कपड़े, दोस्ती, प्रेम संबंध, घूमने-फिरने, किसी जगह जाने या दूसरे व्यक्ति के साथ रहने को लेकर आपत्ति करना इसके उदाहरण हो सकते हैं।सिर्फ असहमति जताना और बात है, लेकिन जब कोई समूह अपनी सोच लागू करने के लिए किसी व्यक्ति को रोकता है, धमकाता है, सार्वजनिक रूप से अपमानित करता है या हिंसा करता है, तो मामला गंभीर हो जाता है। ऐसे कृत्यों पर घटना के तथ्यों के आधार पर आपराधिक कानून लागू हो सकते हैं।

क्या भारतीय कानून में मोरल पुलिसिंग को मान्यता है?

भारतीय कानून में ‘मोरल पुलिसिंग’ के नाम से किसी निजी व्यक्ति या समूह को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं दिया गया है।किसी व्यक्ति या समूह को यह अधिकार नहीं है कि वह खुद किसी दूसरे व्यक्ति को दोषी घोषित करे और फिर उसके लिए सजा तय करे। अगर कोई अपराध हुआ है तो उसकी जांच और कार्रवाई कानून के मुताबिक पुलिस और न्याय व्यवस्था के जरिए होती है।यानी ‘नैतिकता’ का हवाला देकर किसी व्यक्ति के साथ मारपीट, धमकी, जबरदस्ती या यौन हिंसा को जायज नहीं बनाया जा सकता।

जमुई में क्या हुआ?

पुलिस और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, जमुई में दो नाबालिग एक दोपहिया वाहन से लौट रहे थे, तभी कुछ लोगों ने उन्हें कथित तौर पर रोका और उनके साथ बदसलूकी की। घटना का वीडियो रिकॉर्ड किया गया और बाद में सोशल मीडिया पर फैल गया। पुलिस ने वीडियो के आधार पर आरोपियों की पहचान करने की प्रक्रिया शुरू की।पुलिस के अनुसार, इस मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया था और अन्य आरोपियों की तलाश जारी थी। मामले की जांच के लिए एसआईटी भी बनाई गई।बाद में पुलिस ने सोशल मीडिया यूजर्स से वीडियो को शेयर या दोबारा पोस्ट नहीं करने की अपील की। रिपोर्टों के मुताबिक, नाबालिग की पहचान सार्वजनिक करने वाले सोशल मीडिया अकाउंट्स के खिलाफ भी कार्रवाई की गई।

मोरल पुलिसिंग से कौन से मौलिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं?

मोरल पुलिसिंग के अलग-अलग रूप व्यक्ति के कई संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित कर सकते हैं। इनमें मुख्य रूप से अनुच्छेद 14, 19 और 21 महत्वपूर्ण हैं।

अनुच्छेद 14 — समानता का अधिकारसंविधान का अनुच्छेद 14 कानून के सामने समानता और कानून के समान संरक्षण की गारंटी देता है।इसका मतलब है कि किसी व्यक्ति को मनमाने तरीके से अलग व्यवहार या दंड का सामना नहीं करना चाहिए।कोई निजी समूह अपने बनाए नैतिक नियमों के आधार पर किसी व्यक्ति के लिए अलग ‘सजा व्यवस्था’ नहीं बना सकता।

अनुच्छेद 19 — स्वतंत्रता का अधिकारअनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने, संगठन बनाने और देश में स्वतंत्र रूप से आने-जाने जैसी स्वतंत्रताएं देता है। इन अधिकारों पर संविधान के तहत निर्धारित उचित प्रतिबंध लागू हो सकते हैं।लेकिन किसी निजी व्यक्ति की व्यक्तिगत नैतिक सोच अपने आप में दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता को जबरन सीमित करने का कानूनी आधार नहीं बन जाती।

अनुच्छेद 21 — जीवन, गरिमा और निजताअनुच्छेद 21 व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों में निजता और व्यक्ति की गरिमा को भी अनुच्छेद 21 के व्यापक संरक्षण से जोड़ा गया है।इसलिए किसी व्यक्ति को उसकी व्यक्तिगत पसंद या निजी जीवन को लेकर धमकाना, अपमानित करना या हिंसा का सामना कराना गंभीर संवैधानिक सवाल खड़े कर सकता है।

महिलाओं और लड़कियों को क्यों बनाया जाता है निशाना?

मोरल पुलिसिंग की चर्चा में लैंगिक असमानता का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। समाज में महिलाओं और लड़कियों के कपड़ों, दोस्ती, रिश्तों और आने-जाने को लेकर अक्सर अलग-अलग सामाजिक अपेक्षाएं देखने को मिलती हैं।जब इन अपेक्षाओं को लागू करने के लिए दबाव, धमकी या हिंसा का इस्तेमाल किया जाता है, तो इसका असर महिलाओं की स्वतंत्रता, गरिमा और समानता पर पड़ सकता है।इसी वजह से मोरल पुलिसिंग को केवल ‘नैतिकता’ का सवाल मानने के बजाय कानून, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लैंगिक समानता के नजरिए से देखना जरूरी है।

परिवार से भी शुरू हो सकती है मोरल पुलिसिंग

मोरल पुलिसिंग हमेशा सड़क या सार्वजनिक जगह पर ही दिखाई दे, ऐसा जरूरी नहीं है। कई बार परिवार और समाज में भी व्यक्ति के कपड़े, दोस्तों, रिश्तों और व्यवहार को लेकर लगातार नियंत्रण की कोशिश की जाती है।खासकर लड़कियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे क्या पहनें, कहां जाएं, किससे दोस्ती करें और किस तरह व्यवहार करें।परिवार में होने वाला हर नियंत्रण कानूनी अर्थ में ‘मोरल पुलिसिंग’ नहीं कहा जा सकता, लेकिन जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को डर, दबाव या हिंसा के जरिए नियंत्रित किया जाता है, तब यह गंभीर सामाजिक और कानूनी सवाल बन जाता है।

नाबालिग की पहचान सार्वजनिक करना क्यों अपराध हो सकता है?

जमुई मामले में नाबालिगों की पहचान की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है।पॉक्सो एक्ट की धारा 23 के तहत बच्चे की पहचान उजागर करने वाली जानकारी को सार्वजनिक करने पर रोक है। इसमें नाम, पता, तस्वीर, परिवार, स्कूल या ऐसी अन्य जानकारी शामिल हो सकती है, जिससे बच्चे की पहचान सामने आ सकती है।इसलिए वायरल वीडियो को डाउनलोड करके आगे शेयर करना या ऐसी जानकारी पोस्ट करना जिससे पीड़ित नाबालिग की पहचान हो सके, उसके लिए दोबारा नुकसान का कारण बन सकता है। जमुई मामले में पुलिस ने भी वीडियो को आगे साझा नहीं करने की अपील की है और पहचान उजागर करने वाले सोशल मीडिया अकाउंट्स के खिलाफ कार्रवाई की जानकारी दी है।

‘मोरल पुलिसिंग’ के नाम पर हिंसा कितनी गंभीर?

किसी व्यक्ति के व्यवहार से असहमति होना एक बात है और उसके खिलाफ हिंसा या जबरदस्ती करना दूसरी।किसी व्यक्ति या समूह को अपनी राय रखने का अधिकार हो सकता है, लेकिन किसी दूसरे व्यक्ति को जबरन रोकना, धमकाना, मारपीट करना या यौन उत्पीड़न करना ‘नैतिकता’ के नाम पर सही नहीं हो जाता।ऐसी घटनाओं में पुलिस कार्रवाई घटना के वास्तविक तथ्यों और लागू कानूनों के आधार पर होती है।

ऐसी स्थिति में पीड़ित क्या कर सकता है?

अगर किसी व्यक्ति को मोरल पुलिसिंग के नाम पर धमकी, मारपीट, जबरदस्ती या किसी अन्य अपराध का सामना करना पड़े तो सबसे पहले उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है।घटना की शिकायत पुलिस से की जा सकती है। नाबालिग से जुड़े मामलों में पॉक्सो कानून के तहत बच्चे की सुरक्षा और उसकी पहचान की गोपनीयता का विशेष महत्व है।ऐसी घटनाओं के वीडियो को सोशल मीडिया पर फैलाने के बजाय संबंधित जानकारी पुलिस तक पहुंचाना ज्यादा उचित है।

मोरल पुलिसिंग रोकने के लिए क्या किया जा सकता है?

मोरल पुलिसिंग की समस्या केवल पुलिस कार्रवाई से खत्म नहीं होगी। इसके लिए समाज में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और दूसरों के अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने की जरूरत है।स्कूल और कॉलेजों में बच्चों और युवाओं को लैंगिक समानता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अलग-अलग सामाजिक एवं सांस्कृतिक पहचान के प्रति सम्मान के बारे में समझाना जरूरी है।परिवारों में भी बच्चों को यह सिखाना जरूरी है कि किसी व्यक्ति की पसंद अलग होने का मतलब यह नहीं कि उसके साथ अपमान या हिंसा की जा सकती है।वहीं, पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि अपराध की शिकायत मिलने पर कानून के अनुसार कार्रवाई हो और पीड़ित को सुरक्षा मिले।

निष्कर्ष

जमुई की घटना ने ‘मोरल पुलिसिंग’ को लेकर एक पुरानी लेकिन महत्वपूर्ण बहस को फिर सामने ला दिया है। समाज में सही-गलत को लेकर अलग-अलग विचार हो सकते हैं, लेकिन किसी निजी व्यक्ति या समूह को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है।मौलिक अधिकारों का मतलब केवल किताबों में लिखी संवैधानिक बातें नहीं, बल्कि व्यक्ति की समानता, स्वतंत्रता, गरिमा और निजता की वास्तविक सुरक्षा भी है।इसलिए ‘मोरल पुलिसिंग’ के नाम पर होने वाली किसी भी घटना को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि वास्तव में क्या हुआ, क्या किसी व्यक्ति के अधिकार प्रभावित हुए और क्या किसी कानून का उल्लंघन हुआ। जमुई जैसे मामले में खास तौर पर नाबालिगों की पहचान और निजता की रक्षा करना भी उतना ही जरूरी है।

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