14 सितंबर हिन्दी दिवसहिन्दी दिवस

अरूणिमा सिंह भोपाल : 14 सितंबर का दिन भारत के भाषाई इतिहास में खास महत्व रखता है। इसी दिन वर्ष 1949 में संविधान सभा ने हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। हालांकि, हिंदी को लेकर यह फैसला अचानक नहीं हुआ था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में ही महात्मा गांधी सहित कई नेताओं ने ऐसी भाषा की जरूरत पर जोर दिया था, जो देश के अलग-अलग हिस्सों के लोगों के बीच संवाद का माध्यम बन सके।

गांधी की भाषा संबंधी सोच को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि वे हिंदी को केवल साहित्य या सरकारी कामकाज की भाषा के तौर पर नहीं देखते थे। उनके लिए भाषा का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य था—आम लोगों तक पहुंचना और देश के अलग-अलग समुदायों के बीच संपर्क स्थापित करना।

गांधी के लिए भाषा का सवाल, स्वराज से जुड़ा था ।

गांधी ने काफी पहले ही यह सवाल उठाया था कि अगर भारत को अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनानी है, तो देशवासियों के बीच संवाद के लिए अपनी भाषा को भी महत्व देना होगा।1909 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ में उन्होंने भारत की एक साझा भाषा के रूप में हिंदी का समर्थन किया। गांधी का विचार था कि भारत में ऐसी भाषा होनी चाहिए जिसे बड़ी संख्या में लोग समझ सकें और जिसे अलग-अलग लिपियों में लिखने की गुंजाइश भी हो।यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि गांधी जिस ‘हिंदी’ की बात कर रहे थे, उसका अर्थ आज प्रचलित अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ हिंदी से हमेशा एक जैसा नहीं था। समय के साथ गांधी की सोच में हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी के संबंध को लेकर भी स्पष्टता और बदलाव आया।

1917 में गांधी ने बताए थे राष्ट्रीय भाषा के पांच गुण ।

गांधी ने 20 अक्टूबर 1917 को गुजरात एजुकेशनल कॉन्फ्रेंस में राष्ट्रीय भाषा के सवाल पर विस्तार से अपने विचार रखे थे। उन्होंने किसी भाषा को राष्ट्रीय भाषा के योग्य मानने के लिए पांच कसौटियां बताईं।

उनके अनुसार ऐसी भाषा—

  • सरकारी अधिकारियों के लिए सीखना आसान हो।
  • पूरे देश में धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संवाद का माध्यम बन सके।
  • बड़ी संख्या में भारतीयों द्वारा बोली जाती हो।
  • देश के आम लोगों के लिए सीखना आसान हो।
  • उसका चयन किसी अस्थायी या तत्कालीन परिस्थिति के आधार पर न किया गया हो।

इन मानकों पर गांधी ने हिंदी को सबसे उपयुक्त माना। उनके अनुसार अंग्रेजी इन कसौटियों को पूरा नहीं करती थी, जबकि हिंदी देश के बड़े हिस्से में पहले से संपर्क की भाषा के रूप में इस्तेमाल हो रही थी।

गांधी की ‘हिंदी’ सिर्फ संस्कृतनिष्ठ हिंदी नहीं थी

गांधी के भाषा-विचार का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही था।

वे ऐसी हिंदी के पक्ष में नहीं थे जिसे केवल विद्वान ही समझ सकें। उनके लिए आम लोगों की सहज भाषा ज्यादा महत्वपूर्ण थी। उन्होंने हिंदी और उर्दू के बीच कठोर विभाजन को भी स्वीकार नहीं किया।

गांधी ने अपनी व्याख्या में कहा था कि उत्तर भारत में हिंदू और मुसलमान जिस आम भाषा में एक-दूसरे से बातचीत करते हैं, उसे हिंदी कहा जा सकता है और इसे देवनागरी या उर्दू लिपि में लिखा जा सकता है।

वे भाषा में जरूरत से ज्यादा संस्कृत या फारसी-अरबी शब्द भरने के पक्ष में नहीं थे।बाद के वर्षों में गांधी के विचारों में ‘हिंदुस्तानी’ की अवधारणा और अधिक प्रमुख हुई। उनका उद्देश्य ऐसी सहज भाषा की कल्पना करना था जिसमें हिंदी और उर्दू की साझा बोलचाल की परंपरा दिखाई दे।

हिंदी को जनता और राजनीति के बीच पुल मानते थे गांधी

गांधी के लिए भाषा का सवाल केवल साहित्यिक नहीं था। वे चाहते थे कि स्वतंत्रता आंदोलन की बातें अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों तक सीमित न रहें।उनका मानना था कि अगर राजनीतिक आंदोलन को वास्तव में जन-आंदोलन बनाना है, तो नेताओं को जनता की भाषा में संवाद करना होगा। यही कारण था कि वे भारतीय भाषाओं के इस्तेमाल और हिंदी के प्रसार पर जोर देते रहे।

1918 में इंदौर में हिंदी साहित्य सम्मेलन के दौरान भी गांधी ने ऐसी हिंदी की जरूरत पर बल दिया जो हिंदू और मुसलमान दोनों के बीच स्वाभाविक रूप से बोली-समझी जा सके। उन्होंने भाषा को दूसरी भारतीय भाषाओं से शब्द ग्रहण करने वाली और व्यापक जनसमुदाय तक पहुंचने वाली भाषा के रूप में देखा।

फिर संविधान सभा ने ‘राष्ट्रभाषा’ क्यों नहीं कहा?

यहीं से हिंदी के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है।

गांधी हिंदी को ‘राष्ट्रभाषा’ के रूप में देखते थे, लेकिन संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को हिंदी को ‘संघ की राजभाषा’ के रूप में स्वीकार किया। संविधान के अनुच्छेद 343 में स्पष्ट किया गया कि संघ की राजभाषा हिंदी होगी और उसकी लिपि देवनागरी होगी। साथ ही अंग्रेजी के प्रयोग को भी संवैधानिक व्यवस्था के तहत जारी रखा गया।

दरअसल, संविधान सभा में भाषा को लेकर तीखी बहस हुई थी। हिंदी, हिंदुस्तानी, अंग्रेजी और भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल को लेकर सदस्यों के बीच अलग-अलग मत थे। अंततः जिस व्यवस्था पर सहमति बनी, उसमें हिंदी को संघ की राजभाषा बनाया गया, जबकि अंग्रेजी के प्रयोग को भी जारी रखने का प्रावधान रखा गया।

हिंदी आज भी ‘राष्ट्रभाषा’ नहीं, संघ की ‘राजभाषा’ है।

हिंदी दिवस पर अक्सर यह कहा जाता है कि हिंदी भारत की ‘राष्ट्रीय भाषा’ है। लेकिन संवैधानिक रूप से यह सही शब्दावली नहीं है।भारत के संविधान ने हिंदी को संघ की राजभाषा का दर्जा दिया है। भारत सरकार के राजभाषा विभाग के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी और उसकी लिपि देवनागरी है। साथ ही सरकारी कामकाज में अंग्रेजी के प्रयोग की भी व्यवस्था है।संविधान का अनुच्छेद 351 केंद्र सरकार को हिंदी के विकास की जिम्मेदारी भी देता है। इसमें कहा गया है कि हिंदी को विकसित करते समय भारत की मिश्रित संस्कृति की अभिव्यक्ति के लिए दूसरी भारतीय भाषाओं के रूप, शैली और शब्दों को आत्मसात किया जाए।

गांधी की भाषा-कल्पना आज क्यों महत्वपूर्ण है?

गांधी के भाषा संबंधी विचारों को सिर्फ ‘हिंदी बनाम अंग्रेजी’ के विवाद तक सीमित करके देखना उनकी सोच को अधूरा समझना होगा।उनके लिए भाषा का असली उद्देश्य था लोगों तक पहुंचना, संवाद आसान बनाना और देश के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ना। इसी वजह से वे ऐसी हिंदी के समर्थक थे जो आम लोगों की समझ में आए और दूसरी भारतीय भाषाओं से भी संवाद कर सके।

आज जब भारत में अनेक भाषाएं और बोलियां अपनी अलग पहचान रखती हैं, गांधी का यह विचार खास तौर पर महत्वपूर्ण दिखाई देता है कि किसी साझा भाषा के विकास का अर्थ दूसरी भाषाओं को खत्म करना नहीं, बल्कि उनके साथ संवाद स्थापित करना होना चाहिए।यही वजह है कि 14 सितंबर का हिंदी दिवस केवल हिंदी के प्रचार का अवसर नहीं है, बल्कि यह भारत की भाषाई विविधता, स्वतंत्रता आंदोलन और भाषा को लेकर गांधी के विचारों को समझने का भी दिन है।

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