आकांक्षा सिंह, भोपाल: 2 अक्तूबर सुनते ही भारत में सबसे पहले महात्मा गांधी की जयंती याद आती है। लेकिन पिछले करीब एक दशक में सोशल मीडिया की एक पीढ़ी के लिए इस तारीख का एक दूसरा संदर्भ भी बन गया है—अजय देवगन की ‘दृश्यम’। 2015 में रिलीज हुई हिंदी ‘दृश्यम’ ने जिस तारीख को अपनी कहानी का अहम हिस्सा बनाया था, वही तारीख धीरे-धीरे फिल्म के बाहर भी एक मजाक और सांस्कृतिक संदर्भ में बदल गई। फिल्म के करीब 11 साल बाद भी 2 अक्तूबर आते ही सोशल मीडिया पर उसका जिक्र होना बताता है कि कुछ फिल्मी संवाद सिर्फ संवाद नहीं रहते, वे रोजमर्रा की डिजिटल भाषा का हिस्सा बन जाते हैं।

2 अक्टूबर और ‘दृश्यम’ का गहरा कनेक्शन

क्या है 2 अक्तूबर और ‘दृश्यम’ का कनेक्शन?

‘दृश्यम’ की कहानी में 2 और 3 अक्तूबर सिर्फ कैलेंडर की तारीखें नहीं हैं। यही वे तारीखें हैं जिनके इर्द-गिर्द विजय सालगांवकर अपने परिवार को पुलिस की पूछताछ से बचाने के लिए एक पूरी कहानी तैयार करता है। फिल्म में विजय अपने परिवार के साथ पणजी जाने, स्वामी चिन्मयानंद के सत्संग में शामिल होने और वहां पाव भाजी खाने की कहानी तैयार करता है। इसके बाद परिवार का हर सदस्य उसी घटनाक्रम को याद रखता और दोहराता है। बस टिकट, फिल्म टिकट और खाने के बिल जैसे सबूत इस कहानी को विश्वसनीय बनाने की कोशिश का हिस्सा बनते हैं। 

‘याद है ना?’ से शुरू हुआ मीम कल्चर

‘दृश्यम’ का सबसे दिलचस्प असर यह रहा कि फिल्म का एक संवाद रिलीज के कई साल बाद भी सोशल मीडिया पर हर साल लौटता है। 2 अक्तूबर आते ही यूजर्स विजय सालगांवकर की कहानी को अपने अंदाज में दोहराने लगते हैं। कहीं कोई दोस्त को याद दिलाता है कि “2 अक्टूबर को क्या हुआ था”, तो कहीं पूरा ‘दृश्यम’ वाला घटनाक्रम दोबारा सुनाया जाता है। 2023 और 2024 में भी कई मीडिया रिपोर्ट्स ने इस वार्षिक मीम ट्रेंड को दर्ज किया। यहां तक कि ब्रांड्स ने भी इस मौके पर फिल्म के संदर्भ में सोशल मीडिया पोस्ट किए। 

फिल्म से बाहर निकले तीन शब्द—2 अक्तूबर, पाव भाजी और पणजी

किसी फिल्म का पॉप कल्चर में असर सिर्फ उसके डायलॉग याद रहने से नहीं मापा जाता। ‘दृश्यम’ के मामले में कई छोटे-छोटे विवरण भी दर्शकों की सामूहिक याद का हिस्सा बन गए हैं।2 अक्तूबर, पाव भाजी और पणजी ऐसे ही तीन संदर्भ हैं। फिल्म देखने वाले दर्शक इन शब्दों को सुनते ही कहानी की तरफ लौट जाते हैं। यही कारण है कि सोशल मीडिया पर हर साल बनने वाले मीम्स में पूरी फिल्म का नाम लिखने की जरूरत भी नहीं पड़ती—सिर्फ तारीख या पाव भाजी का जिक्र काफी होता है।

क्यों याद रह गई ‘दृश्यम’ की तारीख?

इसके पीछे फिल्म की कहानी की बनावट अहम है। आम तौर पर फिल्मों में कोई तारीख कहानी का हिस्सा होती है और कहानी खत्म होने के साथ उसका महत्व भी खत्म हो जाता है। ‘दृश्यम’ में इसके उलट तारीख को कहानी के सबसे जरूरी सुरागों में बदल दिया गया।विजय अपने परिवार को एक ही घटनाक्रम बार-बार याद करवाता है। इससे दर्शक भी अनजाने में उस तारीख और घटनाओं को याद रखने लगते हैं। फिल्म की यही कहानी बाद में सोशल मीडिया के लिए तैयार मीम टेम्पलेट जैसी बन गई।2022 में ‘दृश्यम 2’ के समय अजय देवगन ने भी माना था कि 2 अक्तूबर के आसपास बनने वाले मीम्स और सोशल मीडिया पर लगातार होने वाली चर्चा ने फिल्म को दर्शकों की याद में बनाए रखने में भूमिका निभाई।

अब 2 अक्तूबर को रिलीज हो रही है ‘दृश्यम: द कन्क्लूजन’

2026 में इस तारीख का महत्व और बढ़ गया है। अजय देवगन की ‘दृश्यम: द कन्क्लूजन’ 2 अक्तूबर को रिलीज हो रही है। फिल्म में अजय देवगन फिर विजय सालगांवकर की भूमिका में हैं। तब्बू, श्रिया सरन और इशिता दत्ता भी फ्रेंचाइजी का हिस्सा हैं, जबकि जयदीप अहलावत और प्रकाश राज नए चेहरों के तौर पर जुड़े हैं। निर्देशन अभिषेक पाठक ने किया है।निर्देशकों और निर्माताओं के लिए यह सिर्फ रिलीज डेट नहीं है। फ्रेंचाइजी की कहानी में जिस तारीख को सालों से याद किया जाता रहा, उसी तारीख को अंतिम अध्याय रिलीज करना अपने आप में एक मार्केटिंग और कहानीगत संदर्भ बन गया है।अभिषेक पाठक ने यह भी स्पष्ट किया है कि हिंदी फ्रेंचाइजी का तीसरा भाग इसका अंतिम अध्याय होगा। यानी विजय सालगांवकर की हिंदी फिल्म वाली कहानी को अब निष्कर्ष तक पहुंचाया जा रहा है।

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