कामना कासोटिया: मध्यप्रदेश के सतना जिले के सरकारी अस्पताल में एक चौंकाने वाली लापरवाही सामने आई है। एक 24 वर्षीय गर्भवती महिला को अस्पताल के डॉक्टरों ने बताया कि उसके पेट में पल रहा बच्चा अब जीवित नहीं है और उसे गर्भपात करवाना होगा। लेकिन जब महिला के परिवार ने एक निजी अस्पताल में दोबारा जांच करवाई, तो पता चला कि बच्चा पूरी तरह स्वस्थ और जिंदा है। बाद में महिला ने निजी अस्पताल में ऑपरेशन से एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया।

क्या है पूरा मामला?

घटना सतना जिले की रहने वाली दुर्गा द्विवेदी, उम्र 24 वर्ष, के साथ हुई। दुर्गा पहली बार मां बनने वाली थीं और 9 महीने की गर्भवती थीं। 14 जुलाई 2025 को जब उन्हें प्रसव पीड़ा हुई तो परिजन उन्हें पहले अमरपाटन सिविल अस्पताल ले गए।

वहां से प्राथमिक जांच के बाद उन्हें सतना जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया।सुबह करीब 9 बजे जिला अस्पताल पहुंचने पर एक सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर ने दुर्गा की जांच कीउन्होंने एक डॉप्लर मशीन से भ्रूण की धड़कन जांची लेकिन कोई आवाज़ नहीं सुनाई दी

इसके बाद सोनोग्राफी भी करवाई गई, जिसमें कोई हरकत नहीं दिखी। डॉक्टरों ने बिना ज़्यादा जांच के दुर्गा और उसके परिवार को कहा कि बच्चा मर चुका है और अब गर्भपात करवाना ही एकमात्र उपाय है

परिवार को हुआ शक, ली दूसरी रायपरिवार को डॉक्टरों की बात पर यकीन नहीं हुआ। दुर्गा की यह पहली डिलीवरी थी और पहले किसी भी जटिलता की बात सामने नहीं आई थी। इसलिए उन्होंने सतना शहर के भरहुत नगर स्थित एक निजी डायग्नोस्टिक सेंटर में दुबारा जांच करवाई।

वहां की जांच रिपोर्ट देखकर सभी हैरान रह गए – बच्चा जिंदा था और पूरी तरह स्वस्थ था।सुरक्षित ऑपरेशन से हुआ स्वस्थ बच्चे का जन्मइसके तुरंत बाद दुर्गा को सतना के ही एक निजी नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने ऑपरेशन कर एक 3.5 किलो का स्वस्थ बच्चा पैदा करवाया। फिलहाल, मां और बच्चा दोनों पूरी तरह सुरक्षित और स्वस्थ हैं।जांच शुरू, दो डॉक्टरों को नोटिसइस मामले के उजागर होने के बाद स्वास्थ्य विभाग हरकत में आया है।

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) ने जिला अस्पताल में कार्यरत दो डॉक्टरों को शोकॉज नोटिस जारी किया हैइसके अलावा सिविल सर्जन और मेडिकल कॉलेज डीन को भी पत्र भेजा गया है और मामले की विस्तृत जांच के आदेश दिए गए हैं।

गंभीर सवाल और लापरवाही के संकेतइस घटना ने सरकारी अस्पतालों की स्वास्थ्य सेवाओं पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। जब डॉप्लर और सोनोग्राफी दोनों में भ्रूण की धड़कन नहीं दिखी, तो क्या जांच में गड़बड़ी थी या उपकरण ठीक से काम नहीं कर रहे थे? या फिर डॉक्टरों ने जल्दबाज़ी में गलत निष्कर्ष निकाल लिया?

स्थानीय लोगों में इस लापरवाही को लेकर गुस्सा है। लोगों का कहना है कि अगर परिवार ने दूसरी राय न ली होती, तो एक जिंदा बच्चे की जान चली जाती। यह घटना न सिर्फ डॉक्टरों की गंभीर लापरवाही को दिखाती है, बल्कि सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं और जिम्मेदारी की कमी को भी उजागर करती है

यह मामला सिर्फ एक गलती नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार जीवन के साथ खिलवाड़ है। सतना जिला अस्पताल में जो हुआ, वह राज्यभर की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एक चेतावनी है। अब ज़रूरत है पारदर्शी जांच, दोषियों पर सख्त कार्रवाई और स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करने की।

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