
13 साल से नियुक्ति की बाट जोह रहे चयनित अभ्यर्थी, राज्य शिक्षा सेवा की व्यवस्था पर फिर उठे सवाल
माही श्रीवास्तव, भोपाल: मध्यप्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग में प्राथमिक से हायर सेकेंडरी तक शिक्षा व्यवस्था को एकीकृत कर शैक्षणिक गुणवत्ता में सुधार लाने के उद्देश्य से गठित राज्य शिक्षा सेवा की परिकल्पना 13 साल बाद भी धरातल पर पूरी तरह लागू नहीं हो सकी है। एक ओर विभाग ने एरिया एजुकेशन ऑफिसर (एईओ) के कार्यालय, संकुल और पोर्टल पर सेटअप तक तैयार कर दिए हैं, लेकिन दूसरी ओर इन पदों पर चयनित अभ्यर्थी आज भी नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं। इसी बीच राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा बीआरसी और एपीसी की नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किए जाने से चयनित एईओ अभ्यर्थियों में एक बार फिर आक्रोश बढ़ गया है।
2013 में हुआ था राज्य शिक्षा सेवा का गठन
मध्यप्रदेश शासन ने वर्ष 2013 में गजट जारी कर राज्य शिक्षा सेवा का गठन किया था। इसका प्रमुख उद्देश्य कक्षा 1 से 12वीं तक के विद्यालयों के लिए एकीकृत प्रशासनिक एवं शैक्षणिक व्यवस्था लागू करना और स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना था।
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत जिला स्तर पर दो सहायक संचालक, एक प्राथमिक/एलिमेंट्री एजुकेशन और दूसरा सेकेंडरी एजुकेशन के लिए, तथा इनके ऊपर उपसंचालक शिक्षा का प्रावधान किया गया था। विकासखंड स्तर पर भी सहायक संचालक के अधीन दो एरिया एजुकेशन ऑफिसर नियुक्त किए जाने थे। इनमें एक एलिमेंट्री और दूसरा सेकेंडरी एजुकेशन की जिम्मेदारी संभालता।
इस व्यवस्था में एलिमेंट्री एजुकेशन के एईओ को विकासखंड स्त्रोत समन्वयक (बीआरसी) तथा सेकेंडरी एजुकेशन के एईओ को विकासखंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) की वर्तमान व्यवस्था का स्थान लेना था। वहीं लगभग 40 से 50 विद्यालयों पर एक संकुल के लिए एईओ की व्यवस्था प्रस्तावित थी।
परीक्षा हुई, परिणाम आया, सत्यापन भी हुआ, फिर नियुक्ति क्यों नहीं?
एईओ के पदों के लिए बाकायदा ऑनलाइन परीक्षा आयोजित की गई। इसमें प्रदेश के शासकीय विद्यालयों में कार्यरत पात्र शिक्षकों, उच्च श्रेणी शिक्षकों एवं प्रधानाध्यापकों को अवसर दिया गया तथा परीक्षा शुल्क भी लिया गया।
8 सितंबर 2013 को परीक्षा आयोजित हुई और 13 सितंबर 2013 को परिणाम घोषित किया गया। इसके बाद चयनित अभ्यर्थियों की सेवा अवधि एवं दस्तावेजों का सत्यापन भी कराया गया। बाद में अनुभव के अंकों तथा पांच वर्ष की सेवा अवधि की पात्रता को लेकर कुछ अभ्यर्थी न्यायालय पहुंचे। इसके पश्चात पात्र अभ्यर्थियों का पुनः सत्यापन कराया गया और सेवा अवधि सहित दस्तावेजों की जांच की गई।
लेकिन इसके बाद पूरी प्रक्रिया आगे बढ़ने के बजाय मामला लंबित होता चला गया। देखते ही देखते 13 वर्ष बीत गए, लेकिन चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति नहीं मिल सकी।
एईओ के कार्यालय और पोर्टल तैयार, फिर भी पद खाली
चयनित अभ्यर्थियों का कहना है कि वर्तमान में लोक शिक्षण संचालनालय की ओर से एईओ की प्रस्तावित व्यवस्था के अनुरूप कई स्तरों पर तैयारी भी की जा चुकी है। एईओ के कार्यालय निर्धारित किए गए हैं, संकुल केंद्रों का निर्धारण किया गया है और शिक्षा पोर्टल पर भी इनका सेटअप तैयार किया जा चुका है। इसके बावजूद चयनित अभ्यर्थियों को पदस्थापना नहीं दी जा रही है।
इस दौरान कई ऐसे अभ्यर्थी जो उस समय माध्यमिक शिक्षक, उच्च श्रेणी शिक्षक अथवा प्रधानाध्यापक के पद पर कार्यरत थे, सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं। ऐसे में 2013 में चयन प्रक्रिया में शामिल अभ्यर्थियों के भविष्य को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं।
दो व्यवस्थाओं के बीच उलझी राज्य शिक्षा सेवा?
जानकारों और चयनित अभ्यर्थियों के अनुसार इस पूरी व्यवस्था के क्रियान्वयन में सबसे बड़ी समस्या स्कूल शिक्षा विभाग के स्तर पर प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के अलग-अलग प्रशासनिक ढांचे में बंटी व्यवस्था को माना जा रहा है।
कक्षा 1 से 8वीं तक की व्यवस्था मुख्य रूप से राज्य शिक्षा केंद्र तथा कक्षा 9वीं से 12वीं तक की व्यवस्था लोक शिक्षण संचालनालय के अधीन संचालित होती है। चयनित अभ्यर्थियों का आरोप है कि एकीकृत राज्य शिक्षा सेवा की प्रस्तावित व्यवस्था के बावजूद दोनों स्तरों पर अलग-अलग व्यवस्थाएं समानांतर रूप से चल रही हैं।
2 सितंबर 2026 के विज्ञापन ने फिर बढ़ाया आक्रोश
अब राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा 2 सितंबर 2026 को बीआरसी एवं एपीसी की नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किए जाने के बाद 13 वर्षों से नियुक्ति की प्रतीक्षा कर रहे एईओ चयनित अभ्यर्थियों में फिर नाराजगी है।
अभ्यर्थियों का कहना है कि यदि राज्य शिक्षा सेवा के तहत बीआरसी और बीईओ की जगह एईओ व्यवस्था लागू की जानी थी, तो वर्तमान में फिर बीआरसी की नियुक्ति क्यों की जा रही है? उनका कहना है कि एक ओर सरकार एईओ व्यवस्था के लिए कार्यालय और प्रशासनिक ढांचा तैयार कर रही है, वहीं दूसरी ओर उसी व्यवस्था के स्थान पर पुराने पदों पर नियुक्तियां करना सरकार की नीति और प्रशासनिक निर्णयों के बीच विरोधाभास को दर्शाता है।
चयनित अभ्यर्थियों की सरकार से मांग
एईओ चयनित अभ्यर्थियों ने मध्यप्रदेश शासन से मांग की है कि बीआरसी की प्रस्तावित नियुक्ति प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाई जाए और वर्ष 2013 में राज्य शिक्षा सेवा के तहत चयनित एरिया एजुकेशन ऑफिसरों को शीघ्र नियुक्ति दी जाए।
अभ्यर्थियों का कहना है कि जब सरकार ने एकीकृत शिक्षा व्यवस्था के लिए परीक्षा आयोजित कर अभ्यर्थियों का चयन किया, शुल्क लिया, परिणाम जारी किया और दस्तावेजों का सत्यापन तक कराया, तो 13 वर्षों तक नियुक्ति लंबित रखने का औचित्य स्पष्ट किया जाना चाहिए।
13 साल का सवाल: आखिर कब लागू होगी राज्य शिक्षा सेवा?
मामला अब केवल कुछ चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्ति तक सीमित नहीं रह गया है। यह प्रश्न प्रदेश की शिक्षा प्रशासन व्यवस्था और सरकार की घोषित नीतियों के क्रियान्वयन से भी जुड़ गया है।
यदि एईओ व्यवस्था लागू की जानी है तो फिर बीआरसी की नियुक्ति क्यों? और यदि बीआरसी व्यवस्था ही जारी रखनी है तो वर्ष 2013 में कराई गई एईओ चयन प्रक्रिया और उसके बाद किए गए सत्यापन का क्या होगा?
13 वर्ष से लंबित इस मामले पर अब सरकार के स्तर से स्पष्ट निर्णय की आवश्यकता महसूस की जा रही है। चयनित अभ्यर्थियों को उम्मीद है कि शासन पूरे प्रकरण का संज्ञान लेकर राज्य शिक्षा सेवा की मूल भावना के अनुरूप एईओ की नियुक्ति पर शीघ्र निर्णय करेगा।
