Surbhi yadav: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई देशों पर भारी भरकम टैरिफ लगाया है। अब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया है लेकिन सरकार के टॉप अधिकारियों ने साफ संकेत दिया है कि कोर्ट चाहे जो फैसला दे ट्रंप के टैरिफ लंबे समय तक रहने वाले हैं। यानी कंपनियों, इकोनॉमिक्स एक्सपर्ट, ट्रेड मिनिस्ट्री सभी को यह मानकर चलना पड़ेगा कि दुनिया अमेरिकी टैरिफ के नए नियमों के साथ जीना सीख ले।

कंपनी के सप्लाई चेन का पूरा गणित बदल गया

अमेरिका की कंपनी का मॉडल पहले यह था कि चीन जैसे सस्ते देश से सामान बनवाओ, फिर अगर चीन महंगा हो गया तो भारत, वियतनाम जैसे देशों की ओर शिफ्ट हो जाओ। लेकिन ट्रंप ने अपने देश पर भी टैरिफ लगा दिए हैं। इस वजह से कंपनियों के लिए तय करना मुश्किल हो गया कि आखिर उत्पादन कहाँ शिफ्ट करें ताकि लागत सस्ती हो। बड़ी कंपनियों के CEO का कहना है टिके रहना वरना कंपनियाँ टूट जाएँगी। कुछ कंपनियाँ फिर से USA में हाई एंड प्रोडक्ट बनाकर और लो वैल्यू पार्ट्स मेक्सिको शिफ्ट करके नई रणनीति बना रही हैं।

ट्रंप के पास टैरिफ लगाने के लिए अलग-अलग कानूनी रास्ते

अगर कोर्ट एक कानून ख़ारिज कर भी दे तो भी ट्रंप दूसरे तरीके से टैरिफ लगा देंगे। 1977 का इमरजेंसी पावर एक्ट, 1974 का ट्रेड एक्ट, 1930 का टैरिफ एक्ट इन सभी में अलग–अलग क्षेत्र हैं जिनमें टैरिफ लागू किए जा सकते हैं। यानी प्रशासन के पास कई रास्ते हैं। इसलिए अफसरों का साफ संकेत है कि टैरिफ को स्थायी मानकर ही नीति बने। इसी वजह से कई देशों ने अमेरिका से पहले ही टैरिफ कम करने के बदले ट्रेड डील कर ली है ताकि भविष्य में ज्यादा नुकसान न हो।

मुनाफा घट रहा है और महंगाई का दबाव बढ़ रहा

शुरुआत में कंपनियों ने बढ़ी हुई लागत खुद पर झेली थी ताकि प्राइस अचानक से ना पड़े। लेकिन अब कपड़े, दवाइयाँ, मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स कई सेक्टर में यह लागत लोगों तक पहुँचना शुरू हो गई है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक टैरिफ की वजह से अमेरिका की महंगाई दर में बढ़ोतरी का असर साफ दिखेगा। दूसरी तरफ निवेशकों को डर है कि अगर कभी टैरिफ हटाने पड़े तो सरकार को और वह डॉलर वापस लौटने की समस्या भी खड़ी हो सकती है।

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