रिया सिन्हा: कर्नाटक कांग्रेस में असंतोष की आग एक बार फिर भड़क उठी है। उप-मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के करीबी माने जाने वाले विधायकों के एक समूह ने पार्टी हाईकमान पर दबाव बढ़ा दिया है। राज्य कैबिनेट में फेरबदल और महत्वपूर्ण बोर्ड/निगमों के प्रमुखों की नियुक्ति की मांग को लेकर यह गुट मुखर हो गया है। माना जा रहा है कि शिवकुमार, जो राज्य पार्टी अध्यक्ष भी हैं, अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए यह रणनीति अपना रहे हैं। आलाकमान के लिए अब यह चुनौती बन गई है कि वह मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और शिवकुमार, दोनों गुटों को साधते हुए पार्टी में एकजुटता बनाए रखे।
असंतुष्ट विधायकों का तीसरा जत्था दिल्ली रवाना
सोमवार को असंतुष्ट विधायकों का तीसरा जत्था राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली पहुंचा। यह कदम दिखाता है कि विधायक अपनी मांगों को लेकर कितने गंभीर हैं। पहले दो जत्थे पहले ही शीर्ष नेताओं से मुलाकात कर चुके हैं। विधायकों की मुख्य शिकायत यह है कि वे अपने निर्वाचन क्षेत्रों के लिए पर्याप्त धन या अधिकार नहीं जुटा पा रहे हैं, और महत्वपूर्ण नियुक्तियों में उनकी उपेक्षा की जा रही है। उनका मानना है कि सरकार में शिवकुमार गुट को अधिक महत्व मिलना चाहिए। इस तरह की लगातार लामबंदी से राज्य सरकार के भीतर खींचतान की खबरें तेज हो गई हैं।
आलाकमान की फिक्र: एकजुटता बनाए रखने की चुनौती
कांग्रेस आलाकमान, विशेष रूप से पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और महासचिव के.सी. वेणुगोपाल, अब इस स्थिति से निपटने के लिए सक्रिय हो गए हैं। उनकी चिंता केवल असंतोष को शांत करना नहीं है, बल्कि अगले लोकसभा चुनावों से पहले पार्टी की छवि और एकजुटता को बरकरार रखना भी है। हाईकमान जल्द ही दोनों प्रमुख नेताओं, सिद्धारमैया और शिवकुमार, के साथ बैठक कर ‘पावर-शेयरिंग’ फार्मूले पर नए सिरे से विचार कर सकता है। दिल्ली में डेरा डाले विधायकों को जल्द समाधान का आश्वासन दिए जाने की संभावना है।
हाईकमान के लिए मुश्किल राह: संतुलन साधना जरूरी
फिलहाल, हाईकमान के लिए सबसे मुश्किल काम यह है कि वह कैबिनेट फेरबदल की मांग पर किस तरह प्रतिक्रिया देता है, क्योंकि इससे मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की स्थिति कमजोर हो सकती है। अगर मांगें नहीं मानी जाती हैं, तो शिवकुमार गुट और अधिक आक्रामक हो सकता है। हाईकमान को कर्नाटक की राजनीति में दोनों अनुभवी नेताओं के बीच एक नाजुक संतुलन साधना होगा, ताकि सत्ताधारी पार्टी के भीतर आंतरिक कलह एक राजनीतिक संकट का रूप न ले ले।

