रिया सिन्हा
चंडीगढ़, जिसे ‘द सिटी ब्यूटीफुल’ के नाम से जाना जाता है, अब बढ़ते वायु प्रदूषण की चपेट में है। शहर का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) एक बार फिर ‘ग्रीन’ (संतोषजनक) जोन से निकलकर ‘येलो’ (मध्यम से खराब) या उससे भी खराब श्रेणियों में पहुँच गया है। कई निगरानी स्टेशनों पर AQI 100-200 के पार दर्ज किया गया है, जो संवेदनशील लोगों के लिए श्वसन संबंधी समस्याओं का संकेत देता है। यह बदलाव मुख्य रूप से पड़ोसी राज्यों पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की बढ़ती घटनाओं के कारण हो रहा है।
पड़ोसी राज्यों में पराली जलने का सीधा असर
वायु प्रदूषण में इस वृद्धि के पीछे सबसे बड़ा कारण पंजाब और हरियाणा के खेतों में धान की कटाई के बाद किसानों द्वारा पराली जलाना है। उत्तर-पश्चिमी हवाओं के साथ यह धुआँ चंडीगढ़ के वातावरण में जमा हो रहा है, जिससे हवा की गुणवत्ता लगातार गिरती जा रही है। पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, इस मौसम में पराली जलाने के मामलों में तेजी आई है, जिसका सीधा असर चंडीगढ़ के निवासियों की सेहत पर पड़ रहा है। धुएं के कारण स्मॉग की स्थिति बन जाती है, जो विजिबिलिटी को कम करती है और हवा को जहरीला बनाती है।
स्वास्थ्य पर खतरा और सरकारी प्रयास
वायु प्रदूषण का बढ़ता स्तर बुजुर्गों, बच्चों और अस्थमा तथा फेफड़ों की बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा करता है। डॉक्टरों ने लोगों को अनावश्यक बाहरी गतिविधियों से बचने और मास्क पहनने की सलाह दी है। चंडीगढ़ प्रदूषण नियंत्रण कमेटी (CPCC) ने स्थिति को देखते हुए संबंधित विभागों को नोटिस जारी किया है और प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए सड़कों पर पानी का छिड़काव और निर्माण गतिविधियों पर निगरानी तेज करने के निर्देश दिए हैं। हालांकि, जब तक पराली जलाने की समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता, चंडीगढ़ की आबो-हवा के लिए खतरा बना रहेगा।

