surbhi yadav: शेख हसीना पर सजा और बड़ा राजनीतिक सवाल बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री अवामी लीग के प्रमुख नेता शेख हसीना को उसे अदालत ने दूसरी कार दे दिया है इसे उन्होंने 2010 में 1971 की मुक्ति संग्राम के दौरान हुए युद्ध अपराधों की सुनाई के लिए बनाया था लेकिन इस फैसले के बाद अब बड़ा सवाल यहां है कि इसका असर अवामी लीग पर कितना पड़ेगा ,वह पार्टी जिसे हसीन आज भी नेतृत्व दे रही है ।राजनीतिक में उनके भविष्य का रास्ता पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल होता दिखाई दे रहा है ।

भारत में मौजूद हसीना और प्रत्यर्पण का दबाव

शेख हसीन इस समय भारत में रह रही है और बांग्लादेश के अंतिम सरकार लगातार उनके प्रत्यर्पण की मांग उठा रही है । पहले भी अदालत है कि अवमानना के मामले में प्रत्यर्पण का अनुरोध भेजा गया था ,लेकिन भारत ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी । आने वाले फरवरी 2026 में आम चुनाव के बाद अगर एक चुनी हुई सरकार सत्ता में आती है ,तो प्रत्यर्पण के मुद्दे पर जोर देती है या हसीना को भारत से राजनीतिक गतिविधियां जारी रखने से रोकने के लिए दबाव बनाती है तो भारत के लिए इस मांग का नजरअंदाज करना चुनौती पूर्ण हो सकता है।

अवामी लीग पर पाबंदी और बढ़ती मुश्किल

फैसले से पहले ही अदालत ने मीडिया को हसीना के उकसाने वाले बयान को प्रकाशित करने से रोक दिया था साथ ही अंतरिम सरकार ने एक आदेश जारी करके अवामी लीग की सभी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया सत्ता से हटाए जाने के बाद अवामी लीग जमीन पर राजनीति में दिखाई नहीं दे रहे हैं ।इससे लगभग सभी बड़े नेता या तो भारत में रह रहे है या गिरफ्तार हो चुके हैं। अब हसीना के बयानों और पार्टी गतिविधियों पर यदि और पाबंदी लगती है तो अवामी लीग के लिए अपनी राजनीतिक पहचान बचना मुश्किल होता जाएगा ।

आगे की रणनीति पर सवाल और बढ़ती मुश्किल

पार्टी का दावा है कि नेतृत्व को लेकर उसके भीतर कोई मतभेद नहीं है लेकिन तेजी से बदलती कानून और कूटनीति स्थिति अवामी लीग को अपनी रणनीति पर विचार करने के लिए मजबूर कर सकती है ,और बांग्लादेश में बनी नई सरकार भारत पर ज्यादा दबाव बनाएगी तो हसीना की वापसी या उसके खिलाफ कार्रवाई का रास्ता और साफ हो सकता है । इस घटनाओं ने बांग्लादेश की राजनीति में भारी मुश्किलें पैदा कर दी है आने वाले हफ्ते और चुनावी माहौल यह तय करेंगे की हसीना और उनकी पार्टी का भविष्य किस दिशा में जाएगा

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