ऋषिता गंंगराडें
21वीं सदी में भारत मंगल ग्रह तक पहुंच चुका है, लेकिन देश के कई आदिवासी क्षेत्रों में आज भी मासिक धर्म (पीरियड्स) को पाप, शर्म और सजा का विषय माना जाता है। जहां एक ओर शहरों में सैनिटरी पैड्स के विज्ञापन खुलेआम टीवी पर चलते हैं, वहीं दूसरी ओर झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों में लड़कियों को मासिक धर्म के दिनों में स्कूल से निकाल देना, घर से बाहर कर देना, और भोजन तक न देना एक आम परंपरा बन चुकी है।
एक सच्ची घटना: झारखंड की 14 साल की मीरा की कहानी
मीरा (बदला हुआ नाम), जो झारखंड के गढ़वा ज़िले की एक आदिवासी लड़की है, पहली बार पीरियड्स आने पर स्कूल गई तो उसके कपड़ों पर दाग लग गया। शिक्षिका ने सबके सामने उसे डांटा और पैरेंट्स को बुलाकर स्कूल से तीन दिन के लिए निकाल दिया। उसका “अपराध” था — सैनिटरी पैड न होना।
मीरा को गांव में ‘अशुद्ध’ मानते हुए अगले चार दिन तक घर के बाहर एक झोपड़ी में रखा गया, जहां उसे ना भरपेट खाना मिला, ना पीने का पानी।
क्या कहती हैं रिपोर्ट्स?
UNICEF और NFHS-5 के अनुसार:
- भारत की करीब 23% लड़कियाँ स्कूल छोड़ देती हैं जब उन्हें मासिक धर्म शुरू होता है।
- 40% से ज्यादा ग्रामीण लड़कियां आज भी कपड़ा या राख का प्रयोग करती हैं।
- आदिवासी क्षेत्रों में यह संख्या और भी अधिक है — 60–70%।
Scroll.in (2024) की फील्ड रिपोर्ट:
- बस्तर (छत्तीसगढ़) और मलकानगिरी (ओडिशा) में लड़कियों को पीरियड्स के दौरान अलग कमरे या गोठ में बंद कर दिया जाता है।
- कुछ गांवों में नदी किनारे बने ‘पीरियड शेड’ में लड़कियों को 5 दिन तक अकेले रहना पड़ता है, जहां बाघ और जहरीले कीड़े का खतरा भी होता है।
क्यों हैं हालात इतने शर्मनाक?
- शिक्षा और जागरूकता की कमी:पीरियड्स को गंदा, शर्मनाक और अपवित्र माना जाता है।
- सैनिटरी पैड्स की अनुपलब्धता या महंगाई:आदिवासी और गरीब इलाकों में सैनिटरी पैड्स ₹5–₹10 प्रति पैड भी महंगे लगते हैं।
- स्कूलों में पानी, टॉयलेट और प्राइवेसी की कमी:कई स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय ही नहीं होता।
- सांस्कृतिक मिथक और पितृसत्तात्मक सोच:मासिक धर्म के दौरान खाना बनाना, मंदिर जाना, या सोना तक मना होता है।
सरकारी योजनाएं — कागज़ पर हकीकत
| योजना | उद्देश्य | हकीकत |
| Ujjwala Yojana for Pads | लड़कियों को मुफ्त पैड देना | बहुत कम गांवों तक पहुंची |
| Rashtriya Kishor Swasthya Karyakram (RKSK) | किशोरियों की हेल्थ | बजट कम, फील्ड में प्रभाव नहीं |
| Menstrual Hygiene Scheme (MHS) | जागरूकता अभियान | स्कूलों में ही सीमित, ग्रामीण क्षेत्रों से दूर |
NGO और स्थानीय प्रयास
कुछ जगहों पर NGO जैसे Goonj, Aakar Innovations, और Sakhi Saheli ने
- कम कीमत वाले कपड़े से बने रीयूज़ेबल पैड्स
- मासिक धर्म पर नुक्कड़ नाटक
- स्थानीय महिलाएं स्वयं सहायता समूह बनाकर पैड्स तैयार कर रहीं
- जैसी पहल शुरू की है, पर वह भी बहुत सीमित दायरे में।
मासिक धर्म कोई अपराध नहीं है
यह शर्मनाक है कि 2025 में भी भारत की बेटियों को पीरियड्स पर सजा मिल रही है, स्कूल छूट रहा है, और उन्हें अस्वच्छता में जीने को मजबूर किया जा रहा है।सैनिटरी पैड कोई लक्ज़री नहीं, मूलभूत अधिकार है।
सरकार, समाज और शिक्षा तंत्र को मिलकर न केवल मुफ्त पैड्स पहुंचाने की जरूरत है, बल्कि सोच बदलने की भी।जब तक मासिक धर्म पर खुले तौर पर बात नहीं होगी, बेटियां सज़ा झेलती रहेंगी।
स्रोत: The Hindu, Scroll.in, UNICEF India, National Family Health Survey (NFHS-5), ग्रामीण NGO रिपोर्ट्स (2023–2024)
