Muskan Garg: सामा-चकेवा पर्व उत्तर बिहार, मिथिला, उत्तर प्रदेश और नेपाल की तराई में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। यह पर्व भाई-बहन के प्रेम और स्नेह का प्रतीक है। यह उत्सव कार्तिक पूर्णिमा से शुरू होकर लगभग दस से बारह दिनों तक मनाया जाता है। लोग इस उत्सव को लोक परंपरा और खुशी से मनाते हैं।
पर्व से संबंधित कथा: किंवदंती कहती थी कि सामा श्रीकृष्ण की पुत्री थीं। एक बार उनपर झूठा आरोप लगाया गया, जिससे वे पक्षी बन गईं। उनके भाई चकेवा ने श्रीकृष्ण से अपनी बहन को बचाने की प्रार्थना की। भगवान ने भाई के सच्चे प्रेम और निष्ठा से प्रसन्न होकर सामा को फिर से मानव बनाया। यह पर्व भाई-बहन के प्रेम और समर्पण का स्मरण कराता है।

पर्व मनाने की विधि: युवतियाँ और महिलाएँ इस उत्सव पर मिट्टी से सामा, चकेवा, चुगला, तोता, डलिया, आदि बनाती हैं। शाम को एक समूह में मिलकर लोक गीत गाती है, खेलती है और पूजा करती हैं। सामा-चकेवा के गीतों में भाई-बहन का स्नेह, स्थानीय जीवन और प्रकृति की सुंदरता का अद्भुत संगम मिलता है।महिलाएँ सभी मूर्तियो को अंतिम दिन, या “विदाई” वाले दिन, किसी तालाब या नदी में विसर्जित कर देती हैं।

पर्व का महत्व: सामा-चकेवा पर्व धार्मिक विश्वास के अलावा पारिवारिक प्रेम, लोककला और सामूहिकता को भी प्रोत्साहित करता है। जैसे चकेवा ने अपनी बहन सामा को जीवन दिया उसका जीवन अपने प्रेम से बचाया वैसे ही, यह पर्व हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम और विश्वास हर चुनौती को पार कर सकता हैं।
