रिपोर्ट रोहित रजक,भोपाल। मध्यप्रदेश में आगामी समय में पूर्व मंत्रियों को फिर से सियासी मंच पर सक्रिय भूमिका में लाने की तैयारी चल रही है। बीजेपी सरकार, खास तौर पर शिवराज सिंह चौहान और नरेन्द्र मोदी सरकार में मंत्री रहे कुछ नेताओं को पुनः राजनीतिक जिम्मेदारियाँ सौंपने की प्रक्रिया पर विचार कर रही है।

इसमें उन्हें निगम-मंडलों में अध्यक्ष या उपाध्यक्ष बनाए जाने की योजना है, जिनका दर्जा कैबिनेट मंत्री या राज्यमंत्री के समान होगा।

विधानसभा चुनाव में नहीं मिली थी टिकट
बीते विधानसभा चुनाव 2023 में कई पूर्व मंत्रियों को पार्टी ने टिकट नहीं दिया था। यह नेता अब बिना किसी पद के हैं। उन्हें पार्टी की मुख्यधारा से जोड़ने और आगामी चुनावों के लिए तैयार करने की दृष्टि से यह कदम उठाया जा रहा है।

पार्टी सूत्रों के अनुसार, भाजपा संगठन ने इन पूर्व मंत्रियों की सूची तैयार की है और जल्द ही अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री मोहन यादव और केंद्रीय नेतृत्व द्वारा लिया जाएगा।

कई नेताओं के नामों पर चर्चा
सूत्रों के मुताबिक जिन पूर्व मंत्रियों को जिम्मेदारी दी जा सकती है उनमें प्रमुख नाम इस प्रकार हैं:

नरोत्तम मिश्रा – भाजपा की पिछली सरकार में गृहमंत्री रहे डॉ. मिश्रा इस समय बिना किसी पद के हैं। वे दतिया से चुनाव तो जीते, लेकिन मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किए गए। अब उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी देने की संभावना है।

गोपाल भार्गव – भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व पंचायत मंत्री रह चुके हैं। बुंदेलखंड में उनका प्रभाव है। पार्टी उन्हें सम्मानजनक पद देकर सक्रिय बनाए रख सकती है।

रमेश मेंदोला इंदौर से विधायक मेंदोला भी पार्टी के पुराने और विश्वसनीय चेहरों में से हैं। वे लगातार संगठन के साथ जुड़े हुए हैं और निगम अध्यक्ष बनने की दौड़ में शामिल माने जा रहे हैं।

उषा ठाकुर – महिला और पर्यटन विभाग की पूर्व मंत्री रही उषा ठाकुर को भी निगम मंडलों में अध्यक्ष बनाया जा सकता है। उनके लिए महिला आयोग या संस्कृति से जुड़ा कोई दायित्व तय हो सकता है।

कई निगम मंडल अध्यक्षों की नियुक्ति लंबित
प्रदेश में लगभग 50 से अधिक निगम-मंडल हैं, जिनमें से अधिकांश अध्यक्षों के पद लंबे समय से खाली हैं। नए चेहरों की नियुक्तियों के साथ पुराने नेताओं को पुनः सक्रिय करने की कोशिश की जा रही है। इनमें से कई पद महत्वपूर्ण विभागों जैसे पर्यटन, उद्योग, परिवहन, शहरी विकास, सामाजिक न्याय इत्यादि से संबंधित हैं।

राजनीतिक संदेश भी है साफ
राजनीतिक पुनर्वास की इस योजना के पीछे पार्टी की रणनीति स्पष्ट है – चुनाव से पहले नाराज या उपेक्षित नेताओं को संतुष्ट करना, संगठन में संतुलन बनाना और जनता के बीच पार्टी की सक्रियता बढ़ाना। साथ ही यह भी संदेश देना कि पार्टी अपने पुराने नेताओं को भुलाती नहीं है।

निगम मंडलों में अध्यक्ष बनने के फायदे
निगम-मंडल में अध्यक्ष बनने पर संबंधित व्यक्ति को सरकारी गाड़ी, स्टाफ, सरकारी आवास और अन्य सुविधाएँ मिलती हैं।

इसके साथ-साथ कैबिनेट मंत्री या राज्यमंत्री का दर्जा मिलने से सियासी प्रभाव भी बना रहता है। इससे वे अपने क्षेत्र और समाज में सक्रिय रहते हैं और पार्टी को मजबूती देते हैं।

अन्य समितियाँ भी होंगी गठित
पार्टी के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार, केवल निगम-मंडल ही नहीं बल्कि जन्मशताब्दी आयोजन समिति, सांस्कृतिक परिषदें और नीति निर्धारण से जुड़ी अन्य समितियाँ भी बनाई जा रही हैं, जिनमें भी पूर्व मंत्रियों को शामिल किया जाएगा।


यह राजनीतिक पुनर्वास की प्रक्रिया भाजपा की एक पुरानी रणनीति रही है जिसमें वरिष्ठ और अनुभवशील नेताओं को संगठनात्मक या प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ देकर उन्हें सक्रिय बनाए रखा जाता है।

इसका लाभ पार्टी को चुनावी स्तर पर भी मिलता है और आंतरिक असंतोष भी कम होता है। अगले कुछ हफ्तों में इस पूरी प्रक्रिया पर अंतिम मुहर लगाई जाएगी और नई नियुक्तियों की औपचारिक घोषणा हो सकती है।


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