काजल जाटवउज्जैन, मध्य प्रदेश: सावन के पवित्र महीने का दूसरा सोमवार यहां की श्रद्धा और राजनीति दोनों का मेल बन गया है। एक ओर उज्जैन में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से प्रमुख महाकालेश्वर की शानदार शाही सवारी निकाली जा रही है, वहीं दूसरी ओर प्रदेश की राजनीति में भी हलचल बढ़ गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव खुद इस रैली का हिस्सा बन रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ कांग्रेस नेता मजारों और मकबरों पर जाकर अपना संदेश देना चाह रहे हैं।

सावन में सियासत

इस बार मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, जो कि उज्जैन के ही रहवासी और शिवभक्त हैं, खासतौर पर इस रैली में हिस्सा ले रहे हैं। उनकी मौजूदगी सिर्फ धार्मिक ही नहीं, बल्कि राजनीति के लिहाज से भी अहम मानी जा रही है। मुख्यमंत्री बनने के बाद यह उनका पहला सावन है, जिसमें वे अपनी धार्मिक जड़ों को सार्वजनिक रूप से दिखा रहे हैं।

वहीं कांग्रेस ने अपनी रणनीति के तहत प्रशिक्षण शिविर शुरू किया है जिसके अंतर्गत मजारों और मकबरों पर जुटकर मत्था टेकेंगे। इसी पर कटाक्ष करते हुए भाजपा नेता हितेश बाजपेयी ने कहा कि ““यहां भाजपा और मुख्यमंत्री खुद को हिंदू आस्था का प्रतीक दिखाने में लगे हैं, वहीं कांग्रेस धार जैसी जगह जहाँ मकबरे और मजार हैं, वहां कौनसा विचार विमर्श करने जा रहे हैं?” उन्होंने कहा कि दोनों पार्टियों की सोंच में काफ़ी अंतर है।

महाकाल की सवारी 

परंपरा, भक्ति और राजनीति का मेल हर साल सावन के सोमवार को उज्जैन में भगवान महाकाल की शाही सवारी निकाली जाती है। इस मौके पर भगवान को चांदी की पालकी में बिठाकर पूरे शहर का भ्रमण कराया जाता है। ढोल, नगाड़े और “हर-हर महादेव” के जयकारे के साथ पूरा माहौल शिवमय हो जाता है। 

आस्था और राजनीति का टकराव

देखा जाए तो कांग्रेस इस कदम को मुस्लिम वोटरों को अपने साथ लाने के लिहाज से उठा रही है, जबकि भाजपा इसे ‘तुष्टीकरण’ की राजनीति बता रही है। धर्म और राजनीतिक तल्खी का मेल सावन का महीना पहले भी धार्मिक गतिविधियों का बड़ा केन्द्र रहा है, लेकिन इस बार चुनावी माहौल के चलते यह और भी अहम हो गया है। दोनों ही दल भाजपा और कांग्रेस अब अपने-अपने पैमानों पर ज्यादा सक्रिय हो कर सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा खुद को ‘धार्मिक परंपराओं का रखवाला’ बताने का प्रयास कर रही है, वहीं कांग्रेस का ताना-बाना ‘खुली धर्मनिरपेक्षता’ का है। 

धार्मिक परंपरा बनाम चुनावी खेल महाकाल की सवारी एक पवित्र परंपरा है, जिसमें श्रद्धा और भक्ति की गहराई देखने को मिलती है। लेकिन इस बार ये रंग भी राजनीतिक रंग से रंगीन हो गई है। उज्जैन जहां शिव भक्ति में डूबा है, वहीं प्रदेश की राजनीतिक चालें भी अपने लक्ष्य पाने के लिए चल रही हैं। सावन सोमवार की ये परेड अब सिर्फ धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों का संकेत भी बन चुकी है।

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