Suvangi Pradhan: कर्नाटक की सियासत एक बार फिर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डी.के. शिवकुमार के बीच जारी अंदरूनी खींचतान को लेकर सुर्खियों में है। कांग्रेस हाईकमान के तमाम प्रयासों के बावजूद दोनों नेताओं के बीच बयानबाज़ी थमने का नाम नहीं ले रही। ताज़ा विवाद शिवकुमार के उस बयान से शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने कहा कि शब्द दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति होते हैं, एक नेता के शब्द ही जनता को दिशा देते हैं।
शिवकुमार का यह बयान क्यों है महत्वपूर्ण
राजनीतिक गलियारों में इस बयान को सूबे की सत्ता संरचना में अपनी दावेदारी मज़बूत करने की कोशिश के तौर पर देखा गया। यही नहीं, शिवकुमार समर्थक लगातार दावा करते रहे हैं कि सत्ता साझा करने के फॉर्मूले के तहत सिद्धारमैया को मध्यावधि में मुख्यमंत्री पद छोड़ना होगा। सिद्धारमैया ने पलटवार करते हुए कहा, शब्दों से बड़ी शक्ति जनता के लिए किए गए कामों में होती है। कर्नाटक की जनता ने हमें विकास और जनकल्याण के लिए चुना है, न कि सत्ता की बयानबाज़ी के लिए।” उन्होंने बिना नाम लिए संकेत दिया कि पार्टी अनुशासन सभी के लिए समान है और सरकार की स्थिरता पर कोई समझौता नहीं होगा।
हाईकमान दोनों नेताओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में लगा है
स्थानीय स्तर पर खेमेबाज़ी का असर सरकार के कामकाज पर दिखने लगा है। मंत्रिमंडल विस्तार से लेकर बजट आवंटन तक कई मामलों में दोनों धड़ों की असहमति खुलकर सामने आई है। यदि यह विवाद जल्द नहीं थमा, तो आने वाले लोकसभा उपचुनावों और स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस की छवि को नुकसान हो सकता है। राज्य में सत्ता विरोधी लहर को रोकने के लिए पार्टी को एकजुटता दिखानी होगी।
क्या यह सिर्फ बयानबाज़ी है या आने वाले महीनों में नेतृत्व परिवर्तन की जमीन तैयार हो रही है
कांग्रेस के लिए यह चुनौती है कि वह न केवल सरकार को स्थिर रखे बल्कि दोनों वरिष्ठ नेताओं की महत्वाकांक्षाओं को संतुलित भी करे। फिलहाल कर्नाटक की राजनीति में यह सवाल तैर रहा है की क्या यह सिर्फ बयानबाज़ी है या आने वाले महीनों में नेतृत्व परिवर्तन की जमीन तैयार हो रही है?
