Muskan Garg: हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन से चौंकाने वाले निष्कर्ष सामने आए हैं, स्तनपान कराने वाली माताओं के दूध में यूरेनियम पाया जा रहा है, जो एक रेडियोधर्मी और विषैला धातु है। महावीर कैंसर संस्थान एंड रिसर्च सेंटर (पटना) और ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्स) दिल्ली ने मिलकर यह शोध किया है।
कौन-किस जिलों में मिला माताओं में जहर?
इस अध्ययन में 40 स्तनपान कराने वाली महिलाओं के दूध के नमूने बिहार के छह जिलों (भोजपुर, समस्तीपुर, बेगुसाराई, खगरिया, कैथहर और नालंदा) से लिए गए थे। सभी चालिस नमूनों में, यानी सभी नमूनों में पूरी तरह से, यूरेनियम पाया गया था। कटिहार में सबसे अधिक स्तर 5.25 g/L (माइक्रोग्राम प्रति लीटर) था, जबकि खगड़िया में औसत के लिहाज से सबसे अधिक स्तर देखा गया।
बच्चों और माताओं की सेहत के लिए खतरा?
शिशुओं के जन्म के पहले कुछ महीनों में किडनी, हड्डी, विकास और नर्वस तंत्र सबसे ज्यादा संवेदनशील होते हैं। यूरेनियम के संपर्क में आने से, विशेषकर नवजातों में, हड्डियों पर प्रभाव, गुर्दे की क्षति, न्यूरोलॉजिक समस्याएं और विकासात्मक समस्याएं हो सकती हैं। शोध ने बताया कि लगभग 70% शिशुओं में “गैर-कैंसरकारी” (लेकिन हानिकारक) प्रभावों की आशंका थी। यद्यपि, अध्ययन के लेखक बताते हैं कि अभी तक किसी संस्था ने माँ के दूध में यूरेनियम के लिए “स्वीकार्य सीमा” नहीं निर्धारित की है।
सवाल: यूरेनियम कहा से आ रहा है?
शोधकर्ता बताते हैं कि संभवत: प्रदूषित भूजल यूरेनियम का मुख्य स्रोत हो सकता है। बिहार में भूजल पर निर्भरता बहुत अधिक है, और औद्योगिक अपशिष्ट, रासायनिक उर्वरक, जमीन की भू–रासायनिक संरचनाएँ, ये सब मिलकर भूजल को दूषित कर देती हैं। अगर पानी दूषित हो, और वही पानी पीने या खाना पकाने में उपयोग किया जाए, तो यूरेनियम फूड-चेन के जरिए शरीर में पहुँच सकता है, और अंत में दूध के माध्यम से बच्चे तक भी।
क्या माताओं को स्तनपान बंद कर देना चाहिए?
इस अध्ययन के बावजूद, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि स्तनपान बंद न करें। क्योंकि स्तनपान नवजातों के लिए पोषण और सुरक्षा का सबसे अच्छा और महत्वपूर्ण स्रोत है। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि स्तनपान के साथ-साथ जल, खाद्य और पर्यावरण की गहन समीक्षा और तत्काल सुधार भी आवश्यक हैं।
सोचने की है जरूरत अब क्या करें: सरकार, समाज और हम?
राज्य स्तर पर जल-पर्यावरण प्रबंधन, नदियों, कुओं और भूजल की जांच की जरूरत है। प्रदूषित जल के उपयोग को रोकने या सुधारने के लिए सुरक्षित पेयजल, फिल्टर और ट्रीटमेंट प्लांट उपलब्ध कराना, जागरूकता अभियान लोगों को मां-बच्चों की सुरक्षा और स्वच्छ जल का महत्व बताना और सबसे महत्वपूर्ण, पर्यावरण और स्वास्थ्य नीतियों में बदलाव ताकि बच्चों का भविष्य सुरक्षित रहे।
यह बिहार का खुलासा सिर्फ एक चिकित्सकीय रिपोर्ट नहीं है, यह एक चेतावनी है कि ज़हर अब हमारे बच्चों, हमारी मिट्टी और पानी तक पहुंच रहा है और हमें इससे बचाव करना होगा ताकि अगली पीढ़ी स्वस्थ, सुरक्षित और भविष्यनिर्मित हो सके, हमें मिलकर काम करना होगा।
