Muskan Garg: दशकों से अमेरिकी डॉलर वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता रहा है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, कच्चे तेल की खरीद-फरोख्त और विदेशी मुद्रा भंडार हर जगह डॉलर की तूती बोलती रही है। डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में “अमेरिका फर्स्ट” नीति के तहत डॉलर की ताकत को अमेरिकी प्रभुत्व का हथियार बनाया गया। प्रतिबंध, टैरिफ और आर्थिक दबाव सब कुछ डॉलर के सहारे। लेकिन अब वही डॉलर-ड्रीम संकट में दिखाई देने लगा है।

भारत-रूस-चीन का नया आर्थिक चक्रव्यूह:
आज वैश्विक मंच पर एक नया समीकरण उभर रहा है। भारत, रूस और चीन जैसे देश धीरे-धीरे डॉलर निर्भरता से बाहर निकलने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। रूस ने पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद ऊर्जा व्यापार में डॉलर के बजाय रूबल और युआन को बढ़ावा दिया। चीन पहले से ही युआन को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनाने की दिशा में आक्रामक कदम उठा रहा है। वहीं भारत भी रूस के साथ व्यापार में रुपये-रूबल व्यवस्था और स्थानीय मुद्राओं के उपयोग को प्राथमिकता दे रहा है।

ब्रिक्स और डि-डॉलराइजेशन की आहट:
ब्रिक्स (BRICS) समूह: भारत, रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका, डॉलर के विकल्प तलाशने में सक्रिय है। साझा भुगतान प्रणाली, वैकल्पिक रिज़र्व मुद्रा और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार जैसे प्रस्ताव वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं। यह प्रक्रिया भले ही धीमी हो, लेकिन दिशा स्पष्ट है, दुनिया एक-ध्रुवीय डॉलर व्यवस्था से बहु-ध्रुवीय मुद्रा व्यवस्था की ओर बढ़ रही है।

ट्रंप की नीति और अमेरिका की मुश्किल:
ट्रंप की आक्रामक विदेश नीति ने अमेरिका के लिए नई चुनौतियां खड़ी करदी है। लगातार प्रतिबंधों और दबाव की राजनीति ने कई देशों को विकल्प खोजने के लिए मजबूर कर दिया है। नतीजा यह हुआ कि डॉलर का डर धीरे-धीरे कम होने लगा। अमेरिका की यह रणनीति अब उसी पर भारी पड़ती नजर आ रही है।

क्या खत्म होगी डॉलर की दादागीरी?
यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि डॉलर की बादशाहत तुरंत खत्म हो जाएगी। अमेरिकी अर्थव्यवस्था अब भी दुनिया की सबसे बड़ी ताकतों में है। लेकिन इतना तय है कि डॉलर अब अजेय नहीं रहा। भारत-रूस-चीन के बढ़ते सहयोग और वैश्विक शक्तियों के बदलते समीकरण अमेरिका की दादागीरी को चुनौती दे रहे हैं।

बदलती वैश्विक तस्वीर:
दुनिया एक नए आर्थिक युग की ओर बढ़ रही है, जहां ताकत सिर्फ एक मुद्रा या एक देश तक सीमित नहीं रहेगी। ट्रंप का डॉलर वाला सपना अब कई मोर्चों पर घिरता दिख रहा है। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अमेरिका खुद को इस नए बहुध्रुवीय आर्थिक संसार के अनुसार ढाल पाता है या फिर इतिहास एक नई दिशा ले लेता है।

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