Muskan Garg: सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो के बाद, उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए न्याय, सुरक्षा और व्यवस्था का प्रतीक बनने वाली „न्याय की प्रतिमा“ आज कल शर्मिंदगी का प्रतीक बन गई है। 5 दिसंबर 2025 को मेरठ के लोहियनगर इलाके में एक दर्दनाक मामला हुआ जब पुलिस ने रात को एक दुकान के बाहर एक अज्ञात व्यक्ति का शव फेंक दिया।

सीसीटीवी: शर्मनाक सच सामने:
सुबह दुकान खोलने पर दुकानदारों को अजनबी युवक का मृत शरीर दुकान के सामने पड़ा मिला। जब उन्होंने सीसीटीवी फुटेज देखी तो सच्चाई सामने आई रात के अन्धियारे में कम-वर्दीधारी पुलिसकर्मी और एक होमगार्ड ई-रिक्शा लेकर आए, शव उतारा और भाग गए। सोशल मीडिया पर जब यह वीडियो वायरल हुआ, तो लोगों में गुस्सा फूटा। कई ने लिखा “इंसानियत मर चुकी है” “कौन होगा अब आम आदमी का रक्षक? ” और “कुछ ने कहा कि ऐसे बढ़ेगा भारत आगे जब पुलिस ही अपराधी है”। उसकी अधिकारियों ने भी निंदा की, और तुरंत कार्रवाई शुरू हुई।

पुलिस की सफाई और सवाल:
पुलिस ने शुरुआत में बताया कि शव शराब या नशे की हालत में पाया गया था, इसलिए उन्होंने उसे डॉक्टर के पास भेजने की बजाय सड़क किनारे छोड़ दिया। लेकिन सीसीटीवी ने स्पष्ट कर दिया कि पुलिस ने जानबूझकर शव फेंका पोस्टमॉर्टम और पंचनामा दर्ज कराने से बचने के लिए। जहां एक ओर तीन पुलिसकर्मी चौकी इंचार्ज, एक सिपाही और होमगार्ड निलंबित कर दिए गए, वहीं एक आंतरिक जांच शुरू की गई है।

न्याय की प्रतिमा पर दाग़: क्या हमारा समाज सुरक्षित है?
हमारे संविधान और व्यवस्था के लिए „न्याय“ एक पवित्र शब्द है। लेकिन जब वही संस्था जो हमें सुरक्षा और इंसाफ देने का वादा करती है अपने दायित्व भूल जाए, तो नागरिकों का विश्वास धूमिल हो जाता है। इस घटना ने एक बार फिर दिखा दिया कि सिर्फ खाकी वर्दी या पद ही इंसानियत और जवाबदेही की जगह नहीं ले सकते। मृतक चाहे अज्ञात हो उसके साथ सम्मान और इंसाफ से सब होना चाहिए था।

अब सवाल उठता है क्या सिर्फ निलंबन और जांच से काम चल जाएगा? या हमें एक ऐसी व्यवस्था चाहिए जहाँ पुलिस और आम आदमी दोनों इस विश्वास के साथ खड़े हों कि “न्याय की प्रतिमा सिर्फ दिखावे के लिए नहीं असल में इंसाफ के लिए” है।

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