कामना कासोटिया भोपाल:
सुप्रीम कोर्ट में सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी पर सवाल
लद्दाख में राज्य के दर्जे और संविधान की छठी अनुसूची लागू करने की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन के बीच हाल ही में एक बड़ा मोड़ सामने आया है। मशहूर पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी ने न सिर्फ लद्दाख बल्कि पूरे देश में राजनीतिक और सामाजिक हलचल पैदा कर दी है। उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो ने अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है और अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दाखिल कर अपने पति की गिरफ्तारी को अवैध करार दिया है।
गिरफ्तारी की पृष्ठभूमि
पिछले कुछ महीनों से लद्दाख में राज्य का दर्जा बहाल करने और क्षेत्र के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधानों की मांग को लेकर लोगों का गुस्सा बढ़ता जा रहा था। इसी सिलसिले में कई प्रदर्शन और रैलियाँ आयोजित की गईं। प्रदर्शन शांतिपूर्ण रूप से शुरू हुए लेकिन हाल ही में स्थिति हिंसक हो गई। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प में फायरिंग हुई और चार लोगों की मौत हो गई। इस घटना के बाद प्रशासन ने हालात को गंभीर मानते हुए सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत हिरासत में ले लिया।
NSA के तहत किसी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए लंबे समय तक हिरासत में रखा जा सकता है। सरकार का तर्क होता है कि उसकी गतिविधियाँ राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा बन सकती हैं। वांगचुक को लद्दाख में न रखकर सीधे राजस्थान की जोधपुर सेंट्रल जेल में भेजा गया।
पत्नी की याचिका में क्या कहा गया?
गीतांजलि आंगमो ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कई गंभीर मुद्दे उठाए हैं। उनका कहना है कि:
- अब तक उन्हें वांगचुक की गिरफ्तारी का आदेश उपलब्ध नहीं कराया गया है।
- परिवार और वकीलों को सोनम वांगचुक से मिलने की इजाजत नहीं मिली।
- शांतिपूर्ण आंदोलन को दबाने के लिए NSA का दुरुपयोग किया गया है।
- यह गिरफ्तारी संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का हनन है।
उन्होंने अदालत से गुहार लगाई है कि उनके पति को तुरंत रिहा किया जाए और सरकार को इस तरह के कठोर कानूनों का दुरुपयोग करने से रोका जाए।
सरकार और पुलिस का पक्ष
लद्दाख प्रशासन और पुलिस ने गिरफ्तारी का बचाव किया है। उनका कहना है कि सोनम वांगचुक के बयानों और भाषणों से लोगों में उग्रता फैली और आंदोलन हिंसक हो गया। पुलिस ने दावा किया कि उन्हें आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी। प्रशासन ने यह भी बताया कि वांगचुक की गतिविधियों को लेकर सुरक्षा एजेंसियाँ गहन जांच कर रही हैं और कई संवेदनशील तथ्य सामने आए हैं।
उठते संवैधानिक सवाल
यह मामला अब सिर्फ एक गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहा। इससे जुड़े कई संवैधानिक सवाल उठ खड़े हुए हैं:
- क्या लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत विरोध प्रदर्शन करने वाले किसी व्यक्ति पर NSA जैसा कठोर कानून लागू किया जा सकता है?
- क्या गिरफ्तारी की प्रक्रिया पारदर्शी और न्यायसंगत रही है?
- राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे स्थापित होगा?
सुप्रीम कोर्ट पहले भी रोकथामात्मक हिरासत से जुड़े मामलों में कह चुका है कि यह एक असाधारण कदम है और इसे केवल दुर्लभ परिस्थितियों में लागू किया जाना चाहिए।
जनता और समाज की प्रतिक्रिया
सोनम वांगचुक लद्दाख और पूरे देश में शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए जाने जाते हैं। उनकी गिरफ्तारी से न केवल उनके समर्थक बल्कि देशभर में कई सामाजिक संगठन नाराज हैं। लोग सोशल मीडिया और धरनों के माध्यम से सरकार के फैसले का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि वांगचुक ने हमेशा शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखी और उन्हें अचानक कठोर कानून के तहत जेल भेजना लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
वहीं, कुछ लोगों का मानना है कि आंदोलन जिस तरह हिंसक हुआ, उससे प्रशासन को कठोर कदम उठाने ही पड़े। उनका तर्क है कि अगर स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाती, तो लद्दाख में कानून-व्यवस्था और बिगड़ सकती थी।
सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं है, बल्कि यह सवाल खड़ा करती है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में विरोध की आवाज़ को कितनी जगह दी जाती है। यह मामला यह भी तय करेगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सरकार कितनी दूर तक जा सकती है और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा के लिए न्यायपालिका कितनी सख्ती दिखाती है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल सोनम वांगचुक के भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि आने वाले समय में आंदोलनों और नागरिक अधिकारों की दिशा भी तय करेगा।
