रिपोर्ट, काजल जाटव: भारतीय राजनीति में जो नेता टिकाऊ और प्रभावशाली रहते हैं, वे सीधे जनता से जुड़े होते हैं। वे जनता के मुद्दों को ही अपना मकसद बनाते हैं। इंडियन नेशनल कांग्रेस के नेता और तराना (214) से विधायक श्री महेश परमार इनमें से हैं। समाजसेवा, संगठन का अनुभव और राजनीतिक संघर्ष की वजह से वे दो बार जनता का भरोसा हासिल कर चुके हैं।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
महेश परमार का जन्म 20 मई 1979 को उज्जैन में हुआ था। उनके पिता स्व. श्री मांगीलाल परमार एक किसान थे। वह ग्रामीण क्षेत्र में पले-बढ़े। छोटी उम्र से ही उन्हें गांव की दिक्कतें दिखीं। पढ़ाई में उनका ध्यान था। उन्होंने एम.ए. और एल-एल.बी. की डिग्री ली। कानून और समाजशास्त्र की जानकारी उन्हें राजनीति में मदद करती है।
पारिवारिक जीवन
महेश का शादी श्रीमती संगीता परमार से हुई। उनके चार बेटियां हैं। उनका परिवार सादी और परंपरागत है। पत्नी और परिवार हमेशा उनके साथ रहे हैं।
पेशा और रुचियाँ
उन्होंने खेती को अपनी नौकरी चुनी। किसान का परिवार होने के कारण जमीन से जुड़ी बातें उन्हें समझ आती हैं। उन्हें समाजसेवा में रुचि है। यही वजह है कि वे जनता के बीच सक्रिय रहते हैं।
राजनीतिक सफर
उनकी शुरुआत स्थानीय सरकार से हुई। वे तीन बार जिला पंचायत के सदस्य चुने गए। फिर वे उज्जैन जिला पंचायत के अध्यक्ष बने। इस काम में उन्होंने सड़क, पानी और हेल्थ जैसे मुद्दों का ध्यान रखा।
उनकी मेहनत और जनता से जुड़ाव ने उन्हें कांग्रेस में बड़ा नाम दिलाया। इसी वजह से उन्हें विधानसभा का टिकट मिला।
- 2018 में पहली बार तराना से विधायक चुने गए।
- 2023 में दोबारा जनता ने भरोसा जताया और वे फिर से विधायक बने।
कार्यों और उपलब्धियों
विधायक बनने के बाद, महेश ने अपने क्षेत्र में कई बातें कही:
- किसानों की बातें: वे फसल का सही दाम, पानी और कर्जा माफी की बात विधानसभा में करते रहे।
- शिक्षा: गावों में स्कूलों का बुरा हाल ठीक करने का प्रयास किया।
- स्वास्थ्य: अस्पतालों में डॉक्टर और दवाइयां पहुंचाने का काम किया।
- बुनियादी ढांचा: तराना की सड़कें और पानी की व्यवस्था सुधारी।
- वंचित वर्ग: दलितों और पिछड़ों के हित का ख्याल रखा। उन्हें मदद पहुंचाई।
वोटिंग पैटर्न और जनता का समर्थन
तराना विधानसभा में कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला होता है। 2018 में महेश परमार ने भाजपा के उम्मीदवार को हराया और पहली बार जीते। इस चुनाव में उन्होंने दलित, किसान और गांव वालों का समर्थन पाया।
2023 के चुनाव में भी उन्होंने अपनी सीट रखी। इस बार जीतने से पता चलता है कि जनता ने उनके पांच साल के काम को माना। वोट देकर लोगों ने दिलचस्पी दिखाई। गांव के लोग ज्यादा वोट दे रहे थे और कांग्रेस का समर्थन मिला।
विवाद और चुनौतियाँ
राजनीति में कोई भी अदना नहीं होता। महेश परमार को भी कुछ आलोचना और विवादों का सामना करना पड़ा:
- काम में देरी: विपक्ष का कहना है कि कुछ सड़क और पानी की योजना समय पर नहीं हो पाई।
- राजनीतिक आरोप: भाजपा ने कहा कि वे सिर्फ अपने फायदे के लिए बातें करते हैं।
- जातीय राजनीति: विरोधी कहते हैं कि वे दलित राजनीति पर जोर देते हैं और बाकी जातियों को अच्छा नहीं दिखाते।
महेश परमार इन सब बातों को खारिज करते हैं और कहते हैं कि वे सबकी बात सुनते हैं।
महेश परमार का जीवन मेहनत का नतीजा है। वह खेती करनेवाले परिवार से हैं। उन्होंने पंचायत से विधानसभा तक का सफर तय किया। दो बार विधायक बनने के बाद जिम्मेदारी भी बढ़ी है। विवाद और आलोचना उनके साथ हैं, लेकिन लोग उनसे जुड़े हैं और जमीन से काम करने पर ज्यादा भरोसा करते हैं। भविष्य में यह देखने का है कि वे अपने वादे पूरे करते हैं और इलाके को नई दिशा देते हैं।
