रिपोर्ट, काजल जाटव: मध्यप्रदेश के राजनीति के क्षेत्र में आदिवासी समुदाय की भूमिका हमेशा बड़ी खास रही है। खरगोन जिले के भगवानपुरा (186) विधानसभा क्षेत्र से चुने गए श्री केदार चिड़ाभाई डावर इसी परंपरा का एक अच्छा उदाहरण हैं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े डावर का रास्ता सामाजिक कार्यकर्ता से जनता के प्रतिनिधि बनने का रहा है।
शुरुआती जिंदगी और पढ़ाई
20 फरवरी 1964 को सांगवी ग्राम (खरगोन जिले) में जन्मे श्री डावर के पिता स्वर्गीय चिड़ाभाई डावर एक साधारण किसान परिवार से थे। गाँव में ही बढ़े-चुने, केदार डावर ने पढ़ाई को बहुत महत्व देते हुए बी.ए. और एल.एल.बी. की डिग्री हासिल की। उनके व्यक्तित्व पर ग्रामीण संस्कृति और आदिवासी जीवनशैली की गहरी छवि देखी जा सकती है।
उनके व्यवसाय की शुरुआत खेती और व्यापार से हुई, लेकिन समाज की सेवा का ज़ज़्बा उन्हें राजनीति की तरफ ले आया। वे शादीशुदा हैं, उनकी पत्नी का नाम श्रीमती कमला डावर है और साथ में उनका परिवार है। उनके एक बेटा और एक बेटी भी हैं।
सामाजिक और राजनीतिक सफर का शुरुआत
केदार डावर का सामाजिक जुड़ाव खासतौर पर आदिवासी संस्कृति और समाज के उत्थान के साथ है। वे लगातार शिक्षा, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक जागरूकता के लिए काम करते आए हैं। कांग्रेस पार्टी के मंच पर उनकी सक्रियता बढ़ी और वे म.प्र. कांग्रेस संबंध समिति के सदस्य भी बने। बाद में जिला कांग्रेस कमेटी, खरगोन के उपाध्यक्ष पद पर रहते हुए उन्होंने अपनी अलग छवि बनाई।
विधायक के तौर पर उनका किरदार
2018 में वो पहली बार भगवानपुरा विधानसभा से कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में चुने गए। ये चुनाव कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए ही मानों प्रतिष्ठा का सवाल था। इस आदिवासी बहुल सीट पर केदार डावर ने स्थानीय मुद्दों – जैसे सिंचाई, सड़कों, स्वास्थ्य सेवाओं और किसान की समस्याओं – को प्रमुखता दी। उनकी साफ-सुथरी छवि और जमीनी स्तर पर जुड़ाव ने उन्हें जीत दिलाई।
2023 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने लगातार दूसरी बार जीत हासिल की। इस बार भी उन्होंने किसान जो बैंक कर्जमाफी, रोज़गार सृजन और आदिवासी कल्याण योजनाओं को चुनावी मुद्दा बनाया।
कामकाज और योगदान
- कृषि और सिंचाई – डावर ने नहरों और सिंचाई की सुविधाओं को बढ़ावा देने पर खास ध्यान दिया। उन्होंने विधानसभा में किसानों के कर्जमाफी का समर्थन भी किया।
- शिक्षा और स्वास्थ्य – आदिवासी बच्चों की पढ़ाई के लिए छात्रावास और स्कूलों की संख्या बढ़ाने की बात कही। साथ ही ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की कमी और दवाओं की आपूर्ति के मुद्दों को उठाया।
- आदिवासी संस्कृति – उन्होंने कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लिया और त्योहारों, मेलों के आयोजन में भी मदद की।
- विधानसभा में सक्रियता – उन्होंने कई विधेयकों पर अपनी राय रखी और आदिवासी हितों से जुड़े मुद्दों पर मतदान किया। भूमि अधिग्रहण और वन कानून को मजबूत बनाने का समर्थन किया।
वोटिंग रिकॉर्ड
1. 2008 चुनाव
- विजेता: जामना सिंह सोलंकी (भाजपा) – 54,010 वोट
- उपविजेता: केदार डावर (कांग्रेस) – 40,986 वोट
- जीत का अंतर: 13,024 वोट
इस समय भगवानपुरा पर भाजपा का दबदबा था।
2. 2013 चुनाव
- विजेता: विजय सिंह सोलंकी (भाजपा) – 67,251 वोट
- उपविजेता: गजेंद्र सिंह (निर्दलीय) – 65,431 वोट
- जीत का अंतर: सिर्फ 1,820 वोट
भाजपा तो जीती, लेकिन मुकाबला बेहद कड़ा था और कांग्रेस उम्मीदवार दूसरे स्थान पर भी नहीं पहुँच पाए।
3. 2018 चुनाव
- विजेता: केदार चिड़ाभाई डावर (कांग्रेस) – 73,758 वोट
- उपविजेता: जामना सिंह सोलंकी (भाजपा) – 64,042 वोट
- जीत का अंतर: 9,716 वोट
इस बार कांग्रेस ने वापसी की। केदार डावर ने भाजपा से सीट छीन ली और आदिवासी बहुल क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत की।
4. 2023 चुनाव
- विजेता: केदार चिड़ाभाई डावर (कांग्रेस) – 99,043 वोट
- उपविजेता: चंद्र सिंह वास्कले (भाजपा) – 86,876 वोट
- जीत का अंतर: 12,167 वोट
लगातार दूसरी बार डावर ने जीत हासिल की। उनकी जीत का अंतर 2018 से थोड़ा बढ़ा, जिससे साफ है कि उनका जनाधार और मजबूत हुआ।
विवाद और आलोचना
जैसे हर नेता के साथ होता है, श्री डावर भी कुछ विवादों से जूझते रहे हैं।
- आंतरिक राजनीति की खींचतान – 2023 के चुनाव में कांग्रेस में टिकट को लेकर कुछ असहमति देखी गई। पर पार्टी ने जरूर उनका साथ दिया और मामला शांत हो गया।
- विकास में धीमापन – विपक्ष का कहना है कि सड़क और स्वास्थ्य जैसे अहम विकास कार्य अभी भी बेहतर स्तर पर पहुंच नहीं सके हैं।
- दोहरे व्यवहार का आरोप – कई बार जनता ने उन्हें सवाल उठाते देखा, पर वहीं सरकारी विभागों पर दबाव डालने में कतरा भी गए।
जनता से मेल-जोल
इन सब आलोचनाओं के बावजूद, श्री डावर अपने क्षेत्र में आसान और प्रिय नेता बनकर उभरे हैं। वह अक्सर गाँवों में जाकर लोगों की समस्याएँ सुनते हैं और उन्हें समाधान के लिए प्रशासन तक पहुंचाते हैं। उनकी पहचान मुख्य रूप से एक सरल और मददगार नेता के तौर पर है।
श्री केदार चिड़ाभाई डावर की कहानी हमें बताती है कि कैसे एक सामान्य किसान परिवार का आदमी लोगों की आवाज बन सकता है। दो बार विधायक चुने जाने से साबित होता है कि जनता ने उनकी ईमानदारी और वफादारी पर भरोसा किया। हाँ, विकास में तेजी और संगठनात्मक चुनौतियाँ अभी भी उनके सामने बड़ी जिम्मेदारी हैं। वक्त आएगा जब देखेंगे कि कैसे वे इन चुनौतियों का हल निकालते हैं और भगवानपुरा विधानसभा को नई दिशा में ले जाते हैं।
