रिपोर्ट, काजल जाटव: मध्य प्रदेश की राजनीति में शाजापुर विधानसभा सीट का अपना खास महत्व है। यहां से जुड़े नेता अक्सर क्षेत्रीय और राज्य स्तर पर चर्चा का विषय रहते हैं। इनमें से एक हैं अरुण भीमावद, जो भारतीय जनता पार्टी के तीरथ से दो बार विधायक बने हैं। किसान परिवार से आने वाले इस नेता ने अपने सामाजिक काम, धार्मिक लगाव और खेल-कूद के शौक की वजह से जनता का भरोसा हासिल किया है।

शुरुआती जीवन

अरुण का जन्म 11 मार्च 1969 को शाजापुर जिले में हुआ। उनके पिता का नाम स्वर्गीय देवी सिंह भीमावद था। एक सामान्य किसान परिवार में जन्म लेने वाले अरुण ने बी.कॉम. किया है। समाज सेवा, धार्मिक गतिविधियों और खेल-कूद में उनकी गहरी रुचि है। लोग उन्हें बहुत जमीन से जुड़े और सादगी भरी जिंदगी जीने वाले व्यक्तित्व के तौर पर जानते हैं।

राजनीतिक सफर

भाजपा से जुड़ने के बाद अरुण ने काफी समय संगठन के कार्य में बिताया। जनता में उनकी छवि एक किसान नेता और समाजसेवक की रही है।

  • 2013 में पहली बार विधायक बने – अरुण भीमावद पहली बार चौदहवीं विधानसभा से शाजापुर से विधायक चुने गए।
  • 2023 में फिर से जीत हासिल की – फिर से जनता ने उन पर भरोसा दिखाया और विधानसभा भेजा।

इन दो कार्यकालों ने उन्हें शाजापुर की राजनीति में एक मजबूत पहचान दी है।

विकास कार्य 

अरुण ने दोनों ही बार अपने क्षेत्र का विकास प्राथमिकता दी।

1. कृषि में सुधार – किसानों को समय पर खाद और बीज दिलाने के लिए उन्होंने आवाज उठाई। सिंचाई और बिजली की समस्याओं को लेकर कई बार सरकार के सामने बात रखी।

2. सड़क और बुनियादी ढांचा – गांव-गांव के रास्तों और शाजापुर शहर की कॉलोनियों में सड़कें बनाने और ठीक करने का काम सबसे ज्यादा किया।

3. शिक्षा और स्वास्थ्य – स्कूलों में शिक्षक की कमी और अस्पतालों में मूल सुविधाओं के अभाव में कई प्रस्ताव दिए।

4. युवा और खेल – खेल-कूद को बढ़ावा देने के लिए लोकल आयोजनों को प्रोत्साहित किया और खेल मैदान और सुविधाओं का इंतजाम किया।

उनकी कोशिश हमेशा जनता से सीधा संवाद करने की रही है, जिसमें वे हर गाँव जाकर छोटी-छोटी परेशानियों को सुनते हैं।

2023 विधानसभा चुनाव और वोट

2023 का विधानसभा चुनाव भी अरुण के लिए आसान नहीं था। इस बार कांग्रेस ने मुकाबला कड़ा किया।

– भाजपा के उम्मीदवार के रूप में अरुण ने बड़े पैमाने पर प्रचार किया।

– किसानों, व्यापारी और ग्रामीण वोटर में उनका बड़ा समर्थन था।

– अंत में, उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार को हरा कर फिर से विधायक पद हासिल किया।

यह जीत पिछली बार से थोड़ी कम भारी पड़ रही थी, जिसका मतलब है कि मुकाबला काफी कड़ा था, लेकिन जनता का भरोसा अभी भी उनके साथ है।

विवाद और आलोचनाएँ

अरुण भीमावद भी वैसे नेताओं की तरह थोड़े विवादों से बच नहीं पाए हैं।

  • स्थानीय विकास में देरी – विपक्ष का कहना है कि कई सड़क और सिंचाई परियोजनाएं अभी भी अधूरी हैं।
  • टिकट वितरण पर नाराज़गी – 2023 के चुनाव में भाजपा के कुछ कार्यकर्ताओं ने उनके नामांकन को लेकर मनमुटाव किया था।
  • जनसंपर्क की सीमाएँ – उनके विरोधियों का मानना है कि वे सभी वर्गों तक उतना अच्छा प्रभाव नहीं छोड़ पाए जितना उम्मीद थी।

फिर भी, उनके समर्थकों का मानना है कि सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने जनता की समस्याओं को हल करने की कोशिश की है।

जनता से जुड़ाव

अरुण भीमावद की सबसे बड़ी खासियत उनकी जमीन से जुड़ी राजनीति है। वो सीधे किसानों और मजदूरों से बातचीत करते हैं। धार्मिक मेलों और सामाजिक कार्यक्रमों में उनकी सक्रिय भागीदारी उन्हें ग्रामीण जनता के करीब ले आती है। उनका अक्सर कहा जाना वाला यह कथन है – “राजनीति मेरे लिए सेवा का जरिया है, पद पाने का साधन नहीं।”

अरुण भीमावद का राजनीतिक सफर दिखाता है कि किसान पृष्ठभूमि और सादगी वाले नेता भी जनता का भरोसा जीत सकते हैं। दो बार विधायक रहकर उनकी जिम्मेदारी अब और बढ़ गई है। आगे अगर वे अधूरे विकास कार्यों को पूरा कर लेते हैं और युवाओं को रोजगार व नए अवसर दे पाते हैं, तो पूरे मालवा क्षेत्र में उनकी लोकप्रियता और भी मजबूत हो सकती है।

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