रोहित रजक। भोपाल: बरकतउल्ला विश्वविद्यालय (BU) से संबद्ध निजी कॉलेजों में सामने आए फर्जी फैकल्टी घोटाले ने उच्च शिक्षा की साख को सवालों के घेरे में ला दिया है। इन कॉलेजों ने ऐसे फैकल्टी मेंबर्स के दस्तावेजों का गलत इस्तेमाल किया, जो वहां कार्यरत ही नहीं थे, लेकिन कॉलेज प्रबंधन ने उन्हें रेगुलर फैकल्टी के रूप में दर्शाया।
प्रोफेसरों की शिकायतों से फर्जीवाड़े का खुलासा
मामला तब सामने आया जब बीयू ने संबद्ध कॉलेजों की फैकल्टी सूची सार्वजनिक की। इसके बाद कई फैकल्टी मेंबर्स ने आपत्ति दर्ज कराई कि वे जिन कॉलेजों में पढ़ा रहे हैं, उनके अलावा भी कई कॉलेजों में उनका नाम रेगुलर फैकल्टी के तौर पर दर्ज है। गुरुवार को ऐसे ही 25 प्रोफेसर ट्रिब्यूनल पहुंचे थे, वहीं शुक्रवार को 15 और फैकल्टी ने इस धोखाधड़ी के खिलाफ शिकायत की।
कोड-28 का उल्लंघन कर रहे कॉलेज
गौरतलब है कि प्राइवेट कॉलेजों के लिए कोड-28 के तहत यह अनिवार्य है कि वे अपनी मान्यता बनाए रखने के लिए पर्याप्त संख्या में रेगुलर फैकल्टी रखें। लेकिन इन कॉलेजों ने अपने अस्तित्व को बचाने के लिए नियमों का उल्लंघन करते हुए दूसरों की डिग्री, आईडी और अनुभव पत्रों का दुरुपयोग किया।
कॉलेज प्रबंधन ट्रिब्यूनल में नहीं हुए पेश
सबसे हैरानी की बात यह है कि जब यह मामला ट्रिब्यूनल में पहुंचा, तब कई कॉलेजों के प्रतिनिधि सुनवाई में उपस्थित ही नहीं हुए। इससे यह साफ होता है कि कॉलेज प्रबंधन अपनी गलती स्वीकारने या सफाई देने से बच रहा है। बीयू प्रशासन ने इस रवैये को गंभीरता से लेते हुए अब संबंधित कॉलेजों को नोटिस भेजने का निर्णय लिया है।
मान्यता हो सकती है रद्द
विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि यह सिर्फ फर्जीवाड़ा नहीं, बल्कि शिक्षा के साथ खिलवाड़ है। यदि कॉलेजों द्वारा संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया, तो उनकी मान्यता रद्द की जा सकती है। बीयू अब मामले की पूरी जांच के बाद संबंधित कॉलेजों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की तैयारी कर रहा है।
अब तक 40 से ज्यादा मामले उजागर
अब तक कुल 40 से अधिक ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें एक ही फैकल्टी मेंबर का नाम दो या अधिक कॉलेजों की सूची में दर्ज था। यह आंकड़ा आने वाले दिनों में और बढ़ सकता है, क्योंकि बीयू ने सभी कॉलेजों की फैकल्टी सूची को पुनः जांच के लिए निर्देशित किया है।
फैकल्टी और छात्रों में असंतोष
इस फर्जीवाड़े से न केवल प्रोफेसर बल्कि छात्र भी असमंजस में हैं। छात्रों का कहना है कि जब उन्हें पढ़ाने वाले प्रोफेसर ही नकली सूची में हों, तो शिक्षा की गुणवत्ता और विश्वसनीयता कैसे बनी रहेगी।

