रिपोर्ट, काजल जाटव: 31 अगस्त को चीन के तियानजिन में होने जा रहा एससीओ (SCO) शिखर सम्मेलन कोई औपचारिक बैठक ही नहीं है, बल्कि यह दुनिया के बड़े शक्ति वर्गीकरण का संकेत भी होगा। इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग समेत 20 देशों के नेता शामिल होंगे।
इसे अमेरिका की टैक्स नीतियों और पश्चिमी वर्चस्व के जवाब में भी देखा जा रहा है। सवाल यह है कि क्या भारत और रूस वाकई में बराबर का साथ देंगे, जबकि इतिहास अक्सर दिखाता है कि चीन के साथ भरोसेमंद दोस्ती कर लेना खतरनाक साबित हो सकता है।
SCO: एशिया की ताकत का मंच
शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की शुरुआत 2001 में हुई थी। शुरू में इसका मकसद आतंकवाद, अलगाववाद, और उग्रवाद से मुकाबला करना था, लेकिन अब यह आर्थिक सहयोग और रणनीतिक साझेदारी का बड़ा मंच बन चुका है। इसके सदस्य देशों में दुनिया की करीब 40 प्रतिशत आबादी और 30 प्रतिशत से भी ज्यादा जीडीपी शामिल है। इस लिहाज से तियानजिन शिखर सम्मेलन न सिर्फ क्षेत्रीय बल्कि पूरे विश्व के लिहाज से भी बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यह मंच भारत के लिए बहुत अहम है। एक तरफ यह भारत को पाकिस्तान और चीन जैसे देशों से बातचीत का मौका देता है, तो दूसरी तरफ रूस और मध्य एशियाई देशों के साथ संबंध मजबूत करने का रास्ता भी खोलता है। इस बार की चर्चा खास तौर पर अमेरिका और यूरोप की संरक्षणवादी आर्थिक नीतियों पर हो सकती है।
भारत, रूस और चीन का समीकरण
अगर भारत, रूस, और चीन मिलकर आर्थिक और रणनीतिक मामले में मजबूत हो जाते हैं, तो यह पश्चिमी देशों के लिए बड़ा झटका होगा। रूस पहले ही यूक्रेन युद्ध के कारण अमेरिका और यूरोप से अलग-थलग पड़ा है और अब वह ज्यादा से ज्यादा एशियाई देशों के साथ गठजोड़ मजबूत कर रहा है। चीन भी अमेरिका की टैरिफ नीति और टेक्नोलॉजी पर लगाए गए प्रतिबंधों से जूझ रहा है। वहीं, भारत को अपने विकास और सुरक्षा दोनों के लिहाज से खूब सतर्क और संतुलित रणनीति अपनानी पड़ रही है।
लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चीन भरोसेमंद साझेदार साबित हो सकता है?
चीन की दोस्ती पर सवाल क्यों?
भारत-चीन संबंध का इतिहास संघर्ष और संदेह से भरा रहा है।
- 1962 का युद्ध भारत के लिए बहुत गहरे जख्म छोड़ गया।
- डोकलाम (2017) और गलवान घाटी (2020) जैसी जगहों पर हुई झड़पें चीन की असली मंशा को दिखाती हैं।
- चीन पाकिस्तान का सबसे बड़ा रणनीतिक साथी है, और CPEC जैसी परियोजनाएं सीधे भारत की संप्रभुता को चुनौती देती हैं।
- चीन लगातार हिंद महासागर में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है और श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार जैसे पड़ोसी देशों में बड़े पैमाने पर निवेश कर भारत को घेरने की कोशिश करता है।
इन तथ्यों से साफ है कि चीन की दोस्ती अक्सर स्वार्थ पर आधारित रही है। उसके कदम भरोसे को तोड़ते रहे हैं।
भारत की रणनीति: संतुलन और सावधानी
भारत को इस शिखर सम्मेलन में अपनी भूमिका ठीक से निभानी है। लेकिन यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि चीन का हर कदम दीर्घकालिक फायदे के लिए होता है। भारत को रूस और मध्य एशियाई देशों के साथ मजबूत संबंध बनाते रहना चाहिए, पर पूरी तरह से चीन पर निर्भर होना खतरनाक है।
भारत की ताकत यही है कि वह पश्चिम और पूर्व के बीच संवाद कायम रखता है। एक तरफ अमेरिका और यूरोप टेक्नोलॉजी और डिफेंस में अपने सहयोगी हैं, तो दूसरी ओर रूस और एशियाई देशों से ऊर्जा और रणनीतिक मदद मिलती है। इस संतुलन को बनाए रखना ही भारत की प्रमुख रणनीति होनी चाहिए।
तियानजिन में 31 अगस्त का शिखर सम्मेलन दिखाएगा कि एशिया में एकजुटता कितनी मजबूत हो सकती है। अगर भारत, रूस, और चीन वास्तव में आर्थिक और राजनीतिक रिश्ते मजबूत कर लेते हैं, तो यह अमेरिका जैसे देशों के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकता है। लेकिन एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि चीन का इतिहास भरोसेमंद दोस्त का नहीं, बल्कि अवसरवादी राजनीति का रहा है।
तो सवाल रहेगा – क्या चीन की मित्रता पर भरोसा किया जा सकता है? शायद नहीं। भारत को समझदारी से काम लेना चाहिए, सहयोग भी करना चाहिए लेकिन सतर्क रहना जरूरी है।
