रिपोर्ट, काजल जाटव: रूस-यूक्रेन युद्ध बहुत बड़ा हो रहा है। एक भारतीय छात्र की कहानी ने दुनिया को चौंका दिया है। गुजरात के मोरबी का 22 साल का लड़का माजोटी साहिल मोहम्मद हुसेन रूस में पढ़ने गया था। लेकिन उसकी जिंदगी बदल गई।
नशीली दवाओं के आरोप में गिरफ्तार होने के बाद, उसने जेल से बचने के लिए एक फैसला लिया। उसने रूस की सेना में शामिल होकर युद्ध लड़ने का फैसला किया। केवल तीन दिन बाद, उसने यूक्रेनी सैनिकों के सामने खुद को सरेंडर कर दिया और कहा, “मुझे यूक्रेन की जेल में रहना अच्छा लगेगा बजाय रूस में लौटने के।”
रूस में पढ़ाई से जेल तक की कहानी
साहिल वह रूस में पढ़ने गया था। वह कंप्यूटर साइंस का कोर्स करना चाहता था। उसके परिवार के लिए यह गर्व की बात थी। लेकिन वहां उसकी जिंदगी बदल गई जब उसे नशीली दवाओं की तस्करी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। रूस की अदालत ने उसे सात साल की जेल दी। वह एक विदेशी छात्र था, इसलिए उसे भाषा और संस्कृति की मुश्किलें थीं। अब वो जेल का ख्याल भी परेशान कर रहा था।
रूस की जेलों से बचने के लिए, उसे एक ऑफर आया। अगर वह रूसी सेना की “विशेष सैन्य कार्रवाई” में शामिल हो जाए, तो उसकी सजा माफ कर दी जाएगी। उसके पास दो ऑप्शन थे — या तो जेल में रहना, या युद्ध में जाना। उसने मजबूर होकर दूसरा ऑप्शन चुना।
जेल से जंग तक — मजबूरी में लिया गया फैसला
साहिल को सेना में शामिल होने से पहले सिर्फ 16 दिन का प्रशिक्षण मिला। इसमें उसे हथियार चलाने और युद्ध की बेसिक बातें सिखाई गईं। उसे बताया गया कि छह महीने काम कर लेने के बाद, उसकी सजा माफ हो जाएगी और उसे पैसे भी मिलेंगे।
पर सच्चाई कुछ और थी। जल्दी-जल्दी ट्रेनिंग हुई और 1 अक्टूबर को उसे मोर्चे पर भेज दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार, वह डोनेट्स्क क्षेत्र में तैनात था। यह इलाका रूस और यूक्रेन के बीच बहुत खतरनाक है।
तीन दिन का युद्ध और फिर सरेंडर
युद्ध के दौरान साहिल बहुत डर गया। उसे भाषा नहीं आती थी। उसे पता नहीं था कि वह किसके लिए लड़ रहा है। गोलियों की आवाज़ के बीच, उसे समझ नहीं आया।
तीसरे दिन उसने अपने कमांडर को कहा कि वह अब और नहीं लड़ सकता। बात-बात पर बहस होने लगी। कमांडर ने उसे धमकी दी। साहिल ने सोचा कि भाग जाना ठीक रहेगा। उसने यूक्रेनी सैनिकों की कीचड़ में चलना शुरू किया। वहां पहुंचकर उसने अपना हथियार फेंक दिया।
रिपोर्ट्स के अनुसार, यूक्रेनी सैनिकों ने पहले उसे पकड़ा। जब पता चला कि वह भारतीय है, तो उसे युद्ध बंदी बना लिया। साहिल ने कहा, “मैं रूस नहीं लौटना चाहता। यहां रहना चाहता हूं।”
“जेल से बेहतर था मरना” — साहिल का बयान
यूक्रेनी मीडिया को दिए वीडियो में साहिल ने कहा कि वह कभी युद्ध में जाना नहीं चाहता था। वह सिर्फ अपनी सजा से बचने के लिए सेना में गया था। “मुझे कहा गया कि छह महीने काम कर लो, सब ठीक हो जाएगा। लेकिन यहां तो हर मिनट मौत का खतरा है। मुझे समझ में आया कि मैंने गलती की।”
उसने यह भी बताया कि उसे पैसे मिलेगा, ऐसा कहा गया था। लेकिन उसे एक रुपया भी नहीं मिला। “हमें खाने को भी अच्छा नहीं मिलता था। कई सैनिक डर के मारे भागने की कोशिश करते थे।”
भारतीय सरकार और परिवार की प्रतिक्रिया
भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने मामले की पुष्टि की प्रक्रिया शुरू कर दी है। मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि “हम इस घटना की जानकारी जुटा रहे हैं और रूस तथा यूक्रेन दोनों सरकारों से संपर्क में हैं।”
साहिल का मामला एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय नैतिक सवाल खड़ा करता है — क्या किसी विदेशी छात्र को जेल की सजा से बचने के लिए युद्ध में भेजना मानवीय है?
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के अनुसार, किसी व्यक्ति को “coercion” यानी दबाव या मजबूरी में लड़ाई के लिए भेजना संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संधियों का उल्लंघन है।
इसके अलावा, यह भी देखा जा रहा है कि अगर साहिल वास्तव में कैदी था और उसे मजबूरी में लड़ने के लिए कहा गया, तो रूस पर युद्ध अपराध (war crime) का आरोप लग सकता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध में विदेशी सैनिकों की भूमिका
रूस ने पिछले दो वर्षों में जेलों से हजारों कैदियों को युद्ध में भेजा है। शुरुआत में यह भर्ती निजी सैन्य कंपनी वैगनर ग्रुप (Wagner Group) के माध्यम से होती थी, जो अब रूसी रक्षा मंत्रालय के अधीन है। कई विदेशी नागरिकों, विशेषकर एशियाई देशों के छात्रों को भी इस प्रकार भर्ती किए जाने के मामले सामने आए हैं।
2023 और 2024 में भी भारत, नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश के नागरिकों के रूस में भर्ती होने और युद्ध में मारे जाने की खबरें आई थीं। भारत ने तब आधिकारिक रूप से रूस से अनुरोध किया था कि भारतीय नागरिकों को सेना में भर्ती न किया जाए।
क्या अब वापसी संभव है?
वर्तमान में साहिल यूक्रेन के नियंत्रण में है और संभवतः किसी सुरक्षित क्षेत्र में पूछताछ के अधीन है। भारतीय दूतावास उसके स्थान की पुष्टि करने की कोशिश में है।
अगर वह वास्तव में यूक्रेनी सेना की हिरासत में है, तो भारत को उसकी कानूनी स्थिति स्पष्ट करने और सुरक्षित वापसी के लिए दोनों देशों से वार्ता करनी होगी।
हालांकि साहिल ने खुद कहा है कि वह रूस वापस नहीं जाना चाहता, परंतु अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के स्तर पर यह निर्णय भारत सरकार को सावधानी से लेना होगा।
साहिल हुसेन की कहानी केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है — यह विदेशों में पढ़ने गए युवाओं के सामने आने वाले जोखिमों और अनजान परिस्थितियों की चेतावनी भी है।
शिक्षा और बेहतर भविष्य के सपने में वह एक ऐसी जंग में घिर गया, जिसका हिस्सा वह कभी बनना नहीं चाहता था।
