Suvangi Pradhan: भारत की ऊर्जा नीति में पिछले कुछ महिनों में एक अहम बदलाव दिख रहा है जहाँ एक ओर रुस से सस्ता क्रूड तेल लेना भारत के लिए अपनी आर्थिक मजबूरी रहा है, वहीं अब इसकी कमी और महँगा पड़ना कई कारणों से जुड़ा है।
सबसे पहली वजह है पश्चिमी प्रतिबंधों का दबाव
अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस को युद्ध के बाद अलग–थलग करने की नीति अपनाई है, जिसमें रूस के तेल के निर्यात पर मूल्य सीमा लगी है। भारत हालांकि कह रहा है कि रूस का तेल प्रत्यक्ष रूप से प्रतिबंधित नहीं है, पर लॉजिस्टिक, बीमा, भुगतान और ट्रांसपोर्ट की चुनौतियाँ निश्चित रूप से बढ़ गई हैं।
दूसरी बड़ी वजह है अमेरिका ने भारत को दबाव में लिया है
ट्रम्प ने भारत से रूस-तेल के आयात को खत्म करने को कहा है और यदि ऐसा नहीं किया गया तो भारत से आयातित वस्तुओं पर २५ % प्रतिवादी शुल्क लगाने की चेतावनी दी है। यह अमेरिका-भारत व्यापार संबंधों में एक तनाव का स्रोत बन गया है और भारत को रूस से सस्ता तेल लेने में सावधानी बरतनी पड़ रही है।
तीसरी वजह है अर्थशास्त्र या लॉजिस्टिक्स का
रूस से मिलने वाला डिस्काउंट अब पहले जितना नहीं रहा। भारत को अब रूस से उतने सस्ते दरों पर तेल नहीं मिल पा रहा जितना युद्ध शुरुआत में मिल रहा था। इसके अलावा, रोक-टोक और बीमा समस्या जैसे कारणों से रूस से कर्ज़ायुक्त या पुरानी टैंकर शिपमेंट्स में देरी हो रही है।
भारत इस माहौल में अपने पैट्रोल-डिजल के मूल्यों व ऊर्जा¬सुरक्षा को ध्यान में रखकर काम कर रहा है
अंत में, भारत अपनी स्रोत विविधता बढ़ा रहा है। अब साउदी अरब, संयुक्त राज्य जैसे पारंपरिक मध्य-पूर्वी देशों से और अमेरिका से भी खरीद बढ़ रही है। यह इसलिए कि अगर रूस-सेल अचानक बाधित हो जाये तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा को खतरा हो सकता है।
