Suvangi Pradhan: ग्रीनलैंड, जो अब तक बर्फ से ढका शांत द्वीप माना जाता था, आज वैश्विक राजनीति का नया केंद्र बनता जा रहा है। आर्कटिक क्षेत्र में तेजी से पिघलती बर्फ ने न केवल जलवायु संकट को उजागर किया है, बल्कि इस इलाके को रणनीतिक और आर्थिक रूप से बेहद अहम बना दिया है।
अमेरिका, रूस और चीन जैसी महाशक्तियों की नजर अब ग्रीनलैंड के नीचे छिपे लाखों टन बहुमूल्य खनिज संसाधनों पर टिकी है
आर्कटिक की बर्फ पिघलने से नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं, जिससे सैन्य गतिविधियों और संभावित हमलों का खतरा भी बढ़ गया है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पहले ही ग्रीनलैंड खरीदने की इच्छा जता चुके हैं। वहीं रूस आर्कटिक में अपने सैन्य ठिकानों को मजबूत कर रहा है, जबकि चीन खुद को नियर-आर्कटिक स्टेट घोषित कर यहां निवेश और प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
ग्रीनलैंड के नीचे रेयर अर्थ मिनरल्स, यूरेनियम, लिथियम और तेल-गैस जैसे संसाधनों का विशाल भंडार है
ये खनिज आधुनिक तकनीक, इलेक्ट्रिक वाहनों, रक्षा उपकरणों और अंतरिक्ष कार्यक्रमों के लिए बेहद जरूरी हैं। इसी कारण अमेरिका, रूस और चीन के बीच यहां प्रभाव बढ़ाने की होड़ तेज होती जा रही है। डेनमार्क के अधीन स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड की सरकार भी इस बदले हुए वैश्विक समीकरण से जूझ रही है। एक ओर आर्थिक विकास के अवसर हैं, तो दूसरी ओर पर्यावरण और स्थानीय आबादी की सुरक्षा का सवाल है।
बर्फ पिघलने से समुद्र स्तर बढ़ने और पारिस्थितिकी तंत्र पर खतरा भी मंडरा रहा है
आने वाले वर्षों में ग्रीनलैंड केवल एक द्वीप नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का अहम केंद्र बन सकता है। यदि महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा सैन्य टकराव में बदलती है, तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा।

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