रिशाली त्रिपाठी गोस्वामी
CPEC अफगानिस्तान तक विस्तार : भारत के लिए रणनीतिक चुनौती
चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का सबसे अहम हिस्सा माना जाता है। इस परियोजना के तहत चीन, पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से लेकर शिनजियांग तक हाईवे, रेल और ऊर्जा गलियारा तैयार कर रहा है। अब पाकिस्तान और चीन इसे अफगानिस्तान तक विस्तार देने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। यह कदम न केवल दक्षिण एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति बदल सकता है, बल्कि भारत के लिए भी बड़ी रणनीतिक चुनौती खड़ी करता है।
अफगानिस्तान का महत्व
अफगानिस्तान भौगोलिक रूप से मध्य एशिया और दक्षिण एशिया को जोड़ने वाला पुल है। वहां तक CPEC का विस्तार होने का अर्थ है कि चीन को मध्य एशिया के ऊर्जा संसाधनों और खनिज भंडार तक सीधी पहुंच मिलेगी। साथ ही पाकिस्तान को भी अफगानिस्तान के जरिए व्यापार और सुरक्षा में गहरी भागीदारी का मौका मिलेगा। अफगानिस्तान की नई सत्ता (तालिबान शासन) चीन और पाकिस्तान से निकटता बढ़ाकर आर्थिक सहयोग की तलाश में है, जिससे यह संभावना और मजबूत होती जा रही है।
भारत के लिए रणनीतिक चुनौती
भारत इस परियोजना को कई कारणों से अपने लिए खतरा मानता है।
1. भौगोलिक अलगाव – अफगानिस्तान तक CPEC पहुंचने का अर्थ है कि भारत मध्य एशिया से और अधिक कट सकता है, जबकि भारत पहले से पाकिस्तान के रास्ते वहां तक सीधी पहुंच नहीं रखता।
2. चीन-पाकिस्तान-तालिबान धुरी – यह धुरी भारत के सुरक्षा हितों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती है। कश्मीर और आतंकवाद से जुड़े मुद्दों में पाकिस्तान और तालिबान का चीन के साथ बढ़ता सहयोग भारत की चिंता बढ़ा सकता है।
3. रणनीतिक घेराबंदी – CPEC का विस्तार “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” रणनीति की तरह भारत को चारों ओर से घेरने की दिशा में एक और कदम होगा। भारत पहले ही हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती सक्रियता से चिंतित है।
4. चाबहार पोर्ट की अहमियत पर असर – भारत ने ईरान के चाबहार पोर्ट को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच के लिए विकसित किया है। लेकिन अगर अफगानिस्तान CPEC का हिस्सा बनता है तो चाबहार की रणनीतिक अहमियत घट सकती है।
निष्कर्ष
CPEC का अफगानिस्तान तक विस्तार भारत के लिए केवल आर्थिक चुनौती नहीं, बल्कि सुरक्षा और रणनीतिक दृष्टि से भी गंभीर खतरा है। यह चीन-पाकिस्तान गठजोड़ को और मजबूत करेगा और अफगानिस्तान को उनकी कूटनीतिक छत्रछाया में ले आएगा। ऐसे में भारत को अपने हित सुरक्षित करने के लिए चाबहार परियोजना, अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों और मध्य एशिया से जुड़ने वाले वैकल्पिक मार्गों पर तेजी से काम करना है l
