Muskan Garg: हाल ही में भारतीय रुपया का मिलावट दर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले न्यूनतम स्तर पर जा पहुँचा है लगभग ₹90.5 प्रति डॉलर। यह गिरावट कई बाहरी और आंतरिक वजहों का नतीजा है, जैसे विदेशी निवेशकों का पैसा बाहर निकालना, व्यापार घाटा, और वैश्विक बाज़ार में अनिश्चितता। लेकिन, इसके बीच सरकार के शीर्ष अर्थशास्त्री वी. अनंत नागेश्वरम का कहना है कि ये “चिंता की बात नहीं” है। उन्होंने कहा है कि इस गिरावट से अभी महंगाई या निर्यात पर कोई असर नहीं हुआ है, और रुपए की हालत आने वाले साल में सुधर सकती है।

गिरावट की वजह डॉलर क्यों हुआ महंगा?
विदेशी निवेश डॉलर की मांग बढ़ी क्योंकि विदेशी पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPI) ने भारत से लगभग 17 बिलियन डॉलर निकाले हैं। व्यापार घाटा जैसे कच्चे तेल, सोना, मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी वस्तुओं के आयात से भारत का व्यापार घाटा बढ़ा है। इससे विदेशी मुद्रा का दबाव और व्रद्धि हुई है। वैश्विक आर्थिक व तूफानी हालात जैसे यूएस-भारत व्यापार समझौते की अनिश्चितता, अंतरराष्ट्रीय तेल व कमोडिटी की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी रुपए को कमजोर करने में भूमिका निभा रहे हैं।

सरकार और अर्थशास्त्रियों की राय: रुपए की गिरावट “खराब नहीं”:
सी.ई.ए नगेस्वरन और अन्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट भारत के मजबूत आर्थिक मूलभूत तथ्यों को नहीं दर्शाती। देश की जी. डी.पी ग्रोथ, कॉर्पोरेट से गतिविधियाँ, रोजगार आदि अच्छे हैं। कमजोर रुपया निर्यातकों के लिए फायदेमंद हो सकता है भारतीय सामान और सेवाएं विदेशों में सस्ते दामों पर बिकेंगी, जिससे विदेशी मुद्रा आय बढ़ सकती है। साथ ही, देश में रेमिटेंस (विदेश से आने वाला पैसा) भी प्रभावी रूप से मजबूती पा सकता है, क्योंकि डॉलर अधिक मूल्यवान हो जाएगा। इसलिए सरकार “सकनापूर्वक शांत” बैठी है और अगले साल सुधार की उम्मीद कर रही है।

रुपया गिरना आम आदमी को फायदा या नुकसान?
नुकसान:
विदेशी सामान, पेट्रोल-डीज़ल, उर्वरक, इलेक्ट्रॉनिक्स, वाहनों जैसी आयातित वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि।
विदेश में पढ़ रहे छात्रों की फीस, विदेश की यात्रा, इंटरनेट- सेवाओं व बांग्लादेश व अन्य विदेशों से माल लाने में खर्च बढ़ना।
ईंधन-आधारित कंपनियों और वस्तुओं पर दबाव, जिससे महंगाई बढ़ सकती है।
फायदे:
भारत से निर्यात करने वाली कंपनियों को प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त उनकी कमाई बढ़ सकती है।
विदेशों से भेजी गई रेमिटेंस (NRIs द्वारा भेजा गया पैसा) अधिक रुपये देगा जिससे उन परिवारों को फायदा हो सकता है।
अर्थ-व्यवस्था में दीर्घकालिक संतुलन कमजोर मुद्रा से निर्यात बढ़े, डॉलर इनफ्लो बढ़े जिससे फंडामेंटल मजबूत रह सकते हैं।

खतरा और उम्मीद दोनों साथ में:
रुपये का 90.5 प्रति डॉलर तक गिरना निश्चित रूप से चिंताजनक है, खासकर उन क्षेत्रों के लिए जो आयात पर निर्भर हैं। लेकिन यह गिरावट बुरा संकेत नहीं है इसके बजाय, यह कुछ अर्थों में अवसर भी दे सकता है। सरकार और अर्थशास्त्री मानते हैं कि निर्यात-उन्मुख नीतियाँ, निवेश, रेमिटेंस प्रवाह और मजबूत आर्थिक आधार रुपये को सुधार सकते हैं। इसलिए, फिलहाल गिरावट को ‘मुश्किल’ से ज़्यादा एक “आर्थिक समायोजन” के रूप में देखना चाहिए जिसमें चुनौतियाँ हैं, पर अवसर भी कम नहीं है।

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