रिपोर्ट, काजल जाटव: ओडिशा के बालेश्वर में फकीर मोहन (स्वायत्त) कॉलेज में एक बीएड द्वितीय वर्ष की छात्रा ने शुक्रवार दोपहर क्लास के सामने ही अपने आप को आग लगा ली। बताया जा रहा है कि, उसने कॉलेज में लगातार चल रहे एक वरिष्ठ शिक्षक से यौन उत्पीड़न की शिकायत कई बार की थी, लेकिन कोई भी कोई गंभीर कार्रवाई नहीं की गई।
छात्रा ने 1 जुलाई को कॉलेज की इंटरनल Internal Complaint committee (ICC) और पास की पुलिस में भी रिपोर्ट दर्ज कराई थी जिसमें उसने बताया कि HOD (Head of Department)- समीर कुमार साहू, ने उसे शारीरिक और मानसिक रूप से परेशान किया, और कहा कि यदि उसने विरोध किया तो उसकी पढ़ाई खत्म कर दी जाएगी। प्रारंभिक जाँच समिति ने 9 जुलाई तक अपनी रिपोर्ट दी, लेकिन न तो कोई सिफारिश की गई और न ही कोई सख्त कदम उठाया गया।
आत्मदाह का भयानक दृश्य
उस दिन छात्रा ने कॉलेज प्रिंसिपल दिलीप कुमार घोष से मिलने का मन बनाया, लेकिन बात थोड़ी उलझ गई। लगभग बीस मिनट की बातचीत के बाद, उसने केरोसिन डालकर खुद को आग लगा ली। उस वक्त एक और छात्र उसकी मदद करने की कोशिश कर रहा था, जिसके चलते उसे भी चोटें आईं हैं।
दोनों को तुरंत जिले के अस्पताल भेजा गया, जहां से उन्हें गंभीर हालत में AIIMS भुवनेश्वर भेज दिया गया। छात्रा की हालत रिपोर्ट के मुताबिक 90–95 फीसदी तक गंभीर है, और डॉक्टर्स की टीम इलाज में लगी हुई है।
प्रशासन की सख्त कार्रवाई
घटना के तुरंत बाद, ओडिशा के उच्च शिक्षा विभाग और राज्य सरकार ने तुरंत ही एक्टिव हो गए। हेड ऑफ डिपार्टमेंट समीर कुमार साहू को गिरफ्तार कर लिया गया है। कॉलेज के प्रिंसिपल दिलीप कुमार घोष को ‘प्रशासनिक लापरवाही’ के आरोप में निलंबित कर दिया गया है।
उच्च शिक्षा मंत्री सूर्यवंशी सूरज ने कहा कि राज्य सरकार ने AIIMS में इलाज, मेडिकल खर्च और आपातकालीन मदद की सारी जिम्मेदारी ले ली है। साथ ही, एक उच्च स्तरीय जांच कमेटी भी बनायी गई है। इस जांच कमेटी में एक महिला संयुक्त सचिव और एक दूसरे कॉलेज की वरिष्ठ महिला प्रिंसिपल शामिल हैं।
बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ योजना की नाकामी बताया है
इस घटना ने राजनीति में भी हलचल मचा दी है: – TMC ने इस पूरी बात को बीजेपी की ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ योजना की नाकामी बताया है। BJD, कांग्रेस और कई अन्य दलों ने सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठाए है और इसे ‘बर्बरता’ और ‘महिला सुरक्षा में विफलता’ का उदाहरण कहा है। पुलिस, रिपोर्टिंग कमेटी, और प्रशासन की भूमिका को भी सवालों के घेरे में ले लिया गया है।
मामला दर्ज किया गया था, लेकिन जब रिपोर्ट में सिफारिश नहीं लगी, तो आरोपी को राहत मिल गई। छात्रा का मानसिक तनाव लगातार बढ़ रहा था और आखिरकार उन्होंने खुद को बचाने का आखिरी सहारा आत्महत्या को माना। इस पूरे मामले ने ये फिर दिखा दिया है कि स्कूल और कॉलेज जैसे संस्थानों में सिस्टम की खामियां, छात्रों की सुनवाई न होना, और प्रशासन का चुपचाप साथ देना इतनी गंभीर समस्याओं को अनदेखा कर जाता है। इन हालात में सिर्फ गिरफ्तारी और जांच कमेटी से काम नहीं चलेगा, हमें तुरंत ICC सिस्टम में सुधार की जरूरत है, समय पर कार्रवाई करनी होगी, मानसिक स्वास्थ्य का पूरा ध्यान देना होगा, और सबसे जरूरी, छात्रों के लिए एक सुरक्षित और सपोर्टिव पढ़ाई का माहौल बनाना चाहिए।
