रानू यादव: अमेरिका में H-1B वीजा पर नई नीति का भारतीय IT कंपनियों पर सीधा असर हो रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने H-1B वीजा के लिए सालाना $100,000 (लगभग ₹88 लाख) का शुल्क लगाने का आदेश दिया है। इस कदम से टीसीएस, इंफोसिस और विप्रो जैसी भारतीय आईटी कंपनियों को बड़ा झटका लग सकता है, जो विदेशी कर्मचारियों को अमेरिका में काम पर रखने के लिए इस वीज़ा पर बहुत अधिक निर्भर हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने H-1B वीजा से जुड़े नियमों को कड़ा करने के लिए एक कार्यकारी आदेश पर दस्तखत किए हैं। इस नए आदेश के तहत, अमेरिका जाने वाले हर H-1B वीजाधारक पेशेवर को एक लाख डॉलर (लगभग 88 लाख रुपये) का अतिरिक्त शुल्क चुकाना होगा। यह नियम 12 महीने तक प्रभावी रहेगा।

इस फैसले का सीधा असर भारतीय आईटी कंपनियों पर पड़ेगा, जो अपने कर्मचारियों को अमेरिका भेजने के लिए इस वीजा पर काफी हद तक निर्भर हैं। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह कदम वीजा प्रणाली के दुरुपयोग को रोकने और अमेरिकी श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए उठाया गया है।

ये भारतीय कंपनियां होंगी ज़्यादा प्रभावित!
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा लाए गए H-1B वीजा के नए नियमों से भारतीय आईटी क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां जैसे टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो और टेक महिंद्रा सबसे ज्यादा प्रभावित होंगी। इन कंपनियों की अमेरिका में अपनी व्यावसायिक रणनीति के लिए H-1B वीजा पर बहुत अधिक निर्भरता है। यह भी देखा गया है कि ये कंपनियां एक तरफ H-1B वीजा पर विदेशी कर्मचारियों को काम पर रख रही थीं, वहीं दूसरी ओर अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी कर रही थीं। एक प्रमुख भारतीय कंपनी ने 2025 में 5,000 से अधिक H-1B वीजा प्राप्त किए, जबकि उसी दौरान 15,000 अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया। इसी तरह, एक अन्य कंपनी को 1,700 वीजा मिले, लेकिन उसने 2,400 अमेरिकी श्रमिकों की छंटनी कर दी। एक तीसरी बड़ी कंपनी ने 2022 से अब तक 27,000 अमेरिकी कर्मचारियों को काम से निकाला है, जबकि उसे 25,000 से अधिक H-1B वीजा मिले हैं।

ट्रंप प्रशासन का यह कदम इसी तरह की विसंगतियों को दूर करने और अमेरिकी श्रमिकों के हितों की रक्षा करने के उद्देश्य से उठाया गया है। यह नई नीति भारतीय कंपनियों के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकती है, क्योंकि अब उन्हें अमेरिका में अपने बिजनेस मॉडल पर फिर से विचार करना पड़ेगा।

दुनिया भर में किन कंपनियों को मिला सबसे ज्यादा एच-1 बी वीजा?
2025 में सर्वाधिक H-1B वीजा प्राप्तकर्ता कंपनियाँअमेजन: 10,044 वीजा, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS): 5,505 वीजा,माइक्रोसॉफ्ट: 5,189 वीजा,मेटा (फेसबुक): 5,123 वीजा,एप्पल: 4,202 वीजा,गूगल: 4,181 वीजा,डेलॉयट: 2,353 वीजा,इंफोसिस: 2,004 वीजा,विप्रो: 1,523 वीजा,टेक महिंद्रा अमेरिका: 951 वीजा शामिल है। इस सूची में अमेज़न सबसे आगे है, जबकि टीसीएस दूसरे स्थान पर है। इसके अलावा, अन्य बड़ी भारतीय आईटी कंपनियाँ जैसे इंफोसिस, विप्रो और टेक महिंद्रा भी इस सूची में शामिल हैं। यह आँकड़ा दर्शाता है कि केवल भारतीय कंपनियाँ ही नहीं, बल्कि अमेरिकी तकनीकी दिग्गज कंपनियाँ भी H-1B वीजा पर काफी निर्भर हैं।

भारतीयों को कैसे होगी परेशानी?
ट्रंप के इस नए आदेश से भारतीय पेशेवरों के लिए अमेरिका में काम करना और भी मुश्किल हो जाएगा। यहां कुछ प्रमुख तरीके दिए गए हैं जिनसे भारतीयों को परेशानी होगी:

1. वित्तीय बोझ में वृद्धि:
H-1B वीजा के लिए $100,000 (लगभग ₹88 लाख) का अतिरिक्त शुल्क एक बड़ा वित्तीय बोझ है। यह कंपनियों को कम वेतन वाले या जूनियर स्तर के कर्मचारियों को अमेरिका भेजने से हतोत्साहित करेगा। इसका सीधा असर उन भारतीय पेशेवरों पर पड़ेगा जो करियर की शुरुआत में अमेरिका में अनुभव प्राप्त करना चाहते हैं।


2.नौकरी के अवसर कम होंगे:
कंपनियों के लिए विदेशी कर्मचारियों को इतनी महंगी लागत पर नियुक्त करना अव्यावहारिक हो जाएगा। इससे वे अमेरिका में भारतीय पेशेवरों को काम पर रखने के बजाय, स्थानीय अमेरिकी कर्मचारियों को प्राथमिकता दे सकती हैं। इसका मतलब है कि भारत से अमेरिका जाने के इच्छुक पेशेवरों के लिए नौकरियों के अवसर कम हो जाएंगे।

3.भर्ती प्रक्रिया पर असर:
भारतीय आईटी कंपनियों की अमेरिका में भर्ती प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित होगी। जिन कंपनियों का मॉडल H-1B वीजा पर निर्भर करता है, उन्हें अपनी रणनीति बदलनी पड़ेगी। वे ऑफशोरिंग (भारत से ही काम करना) पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकती हैं, जिससे अमेरिका में ऑन-साइट काम करने वाले भारतीय पेशेवरों की संख्या में गिरावट आएगी।

यह कदम भारतीय पेशेवरों के लिए अमेरिका में काम करने के सपने को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना देगा, जबकि दूसरी ओर, यह अमेरिका में स्थानीय श्रमिकों के लिए रोजगार के नए अवसर खोल सकता है।

इस फैसले पर ट्रंप का बयान?
ट्रंप प्रशासन का मानना है कि एच-1बी वीजा का गलत इस्तेमाल हो रहा है, जिसकी वजह से अमेरिकी श्रमिकों को नुकसान हो रहा है। प्रशासन का कहना है कि यह कदम वीजा प्रणाली में सुधार और अमेरिकी कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए उठाया गया है। ट्रंप प्रशासन का यह कदम यह सुनिश्चित करने के लिए है कि H-1B वीजा का उपयोग केवल उन उच्च-कुशल और विशिष्ट पेशेवरों के लिए हो, जिनकी अमेरिकी अर्थव्यवस्था को वास्तव में जरूरत है, न कि सस्ते श्रम के विकल्प के रूप में। जारी आदेश में बताया गया है कि 2000 से 2019 के बीच अमेरिका में विदेशी विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, गणित (एसटीईएम) वर्कर्स की संख्या 1.2 मिलियन से बढ़कर 2.5 मिलियन हो गई है।

कंप्यूटर और मैथ से जुड़ी नौकरियों में विदेशी वर्कर्स की हिस्सेदारी 17.7% से बढ़कर 26.1% हो गई है। आईटी कंपनियां सस्ते विदेशी वर्कर्स लाकर अमेरिकियों की नौकरियां छीन रही हैं। गौरतलब है कि यह फैसला अभी एक साल तक लागू रहेगा, हालांकि प्रशासन ने इस बात का भी संकेत दिया है कि अगर जरूरत पड़ी तो इसे आगे भी बढ़ाया जाएगा।

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