रोहित रजक भोपाल/नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने राज्यसभा में साफ कर दिया है कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना से ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाने की ना तो कोई मौजूदा योजना है और ना ही ऐसा कोई इरादा है। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने यह जानकारी राज्यसभा में लिखित जवाब के माध्यम से दी।
क्या कहा सरकार ने ?
गुरुवार को राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बताया कि संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ जैसे शब्द 1976 में 42वें संविधान संशोधन के तहत जोड़े गए थे। उस समय देश में आपातकाल लागू था और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने यह संशोधन कराया था। सरकार ने कहा कि ये दोनों शब्द भारतीय संविधान के मूल सिद्धांतों के साथ जुड़ चुके हैं और इन शब्दों को हटाने की कोई योजना नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी याचिका
सरकार की यह प्रतिक्रिया तब आई है जब संविधान संशोधन को चुनौती देने वाली याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थीं। हालांकि नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं को खारिज कर दिया था।
दरअसल, संविधान की प्रस्तावना में 1949 में ‘We, the people of India…’ के तहत भारत को एक सार्वभौमिक, लोकतांत्रिक गणराज्य कहा गया था। लेकिन 1976 के आपातकाल के दौरान इसमें ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़े गए। इसके बाद से समय-समय पर कुछ संगठनों और लोगों द्वारा यह मांग की जाती रही है कि इन शब्दों को हटाया जाए क्योंकि ये मूल संविधान में नहीं थे।
आरएसएस की मांग और चर्चा
इस मुद्दे को आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के वरिष्ठ पदाधिकारी दत्तात्रेय होसबोले द्वारा भी उठाया गया था। उन्होंने आपातकाल के 50 साल पूरे होने पर इस पर चर्चा करते हुए कहा था कि यह संशोधन लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विरुद्ध था। इसके बाद एक बार फिर से इस मुद्दे को लेकर बहस छिड़ गई थी।
42वां संशोधन: एक ऐतिहासिक बदलाव
आपको बता दें कि 42वें संविधान संशोधन को भारतीय संविधान का सबसे बड़ा संशोधन माना जाता है। यह संशोधन आपातकाल के दौरान 1976 में लाया गया था और इसके तहत संविधान की प्रस्तावना में तीन शब्द जोड़े गए थे: समाजवाद धर्मनिरपेक्ष, राष्ट्रीय एकता
इस संशोधन को लेकर तब से लेकर अब तक कई बार आलोचना और समर्थन दोनों होते रहे हैं। आलोचकों का मानना है कि संविधान के मूल ढांचे में बिना व्यापक बहस के बदलाव करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
सरकार का साफ रुख
राज्यसभा में सरकार के लिखित उत्तर में यह भी कहा गया कि सरकार इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक रुख नहीं रखती, यानी ना तो वह इन शब्दों को हटाने के पक्ष में है और ना ही इसका कोई प्रस्ताव विचाराधीन है। सरकार का मानना है कि यह शब्द संविधान की आत्मा बन चुके हैं और इन पर फिलहाल किसी तरह की छेड़छाड़ की कोई जरूरत नहीं है।
