रिपोर्ट-उज्जैन, काजल जाटव: सावन का पहला सोमवार और भगवान शिव की भक्ति। इस सुनहरे मौके का मिलन बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन में देखने को मिला, जहां करीब 2 लाख श्रद्धालु भगवान महाकालेश्वर के दर्शन को उमड़ पड़े। भक्ति भाव और आस्था से भरे इस दिन ने फिर एक बार उज्जैन के इतिहास में अलग ही जगह बना ली, जब महाकाल की पहली सवारी शहर की गलियों में निकली।

चांदी की पालकी में विराजे महाकाल 

हर साल सावन के पहले सोमवार को भगवान महाकाल की पारंपरिक शाही सवारी निकाली जाती है। इस बार भी देशभर से श्रद्धालु उज्जैन आए। इस विशेष अवसर पर भगवान को चांदी की पालकी में विराजमान कर भव्य शोभायात्रा निकाली गई। शहर अबीर – गुलाल से नहाया हुआ था, रास्ते भर ढोल – नगाड़े, शिव भजनों और जयकारों की धुन से पूरा शहर गूंज रहा था। सुरक्षा के लिए पुलिस ने कड़ी व्यवस्था जारी की थी ताकि सब कुछ सही तरीके से हो सके। सवारी महाकालेश्वर मंदिर से शुरू होकर हरिफाटक ब्रिज, रामघाट, दानीगेट होते हुए फिर से मंदिर परिसर में जा पहुंची।

सवारी में रही पूरी निगरानी 

उज्जैन में श्रद्धालुओं का मेला देखकर प्रशासन ने पहले से ही खूब इंतजाम किए हुए थे। 1500 से ज्यादा पुलिसवाले तैनात थे, साथ में 300 से ज्यादा CCTV कैमरे और ड्रोन की मदद से कोने – कोने में नजर रखी जा रही थी। शहर के मुख्य जगहों पर मेडिकल टीमें और पानी का इंतजाम किया गया था। यह समय सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि उज्जैन की एक सांस्कृतिक पहचान भी बन चुका है। सावन के पहले सोमवार को आस्था, परंपरा और लोगों की ऊर्जा एक साथ नजर आती है। शहर के व्यापारी, सामाजिक संगठन और स्थानीय लोगों ने श्रद्धालुओं का दिल खोलकर स्वागत किया, ताकि माहौल और भी पवित्र दिखे। यह दिन उज्जैन के लिए कोई साधारण त्योहार नहीं, बल्कि एक अर्थपूर्ण सांस्कृतिक और भावनात्मक जश्न है।

कावड़ यात्रा का पहला जत्था

सावन का महीना 11 जुलाई 2025 को शुरू हुआ था। बलवाड़ी से उज्जैन तक की यह कावड़ यात्रा करीब 275 किलोमीटर लंबी है और इसे पूरा करने में लगभग 7 दिन लगे। सावन के पहले सोमवार को उज्जैन में कावड़ यात्रा ने बहुत ही ऐसा धार्मिक जलसा दिखाया कि पूरे माहौल में श्रद्धा की झलक देखने को मिल रही थी। लगभग 2 लाख श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल हुए, और बलवाड़ी से शुरू होकर 275 किलोमीटर की ये कावड़ यात्रा श्रद्धा और भक्ति का एक बड़ा प्रतीक बन गई। ये आयोजन शिव भक्ति की गहरी आस्था का अनुभव रहा। महाकाल की झांकी और कावड़ यात्राएं लाखों भक्तों को आकर्षित कर रही हैं, यह दिखाने के लिए कि शिव भक्ति की यह परंपरा आने वाले समय में और भी बड़ी हो जाएगी।

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