रिपोर्ट रोहित रजक भोपाल |
प्रदेश में “एकल नल जल योजनाओं” के संचालन एवं संधारण (ऑपरेशन एंड मेंटेनेंस) को लेकर बनी ज़रूरी नीति पिछले दो महीने से लटकी हुई है।
इसका मुख्य कारण यह है कि जिम्मेदार दो विभागों – पीएचई (लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी) और पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्रालय के मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल एवं संपतिया उईके की अब तक एक साथ बैठक ही नहीं हो सकी।

नीति तैयार हो चुकी है लेकिन बिना दोनों विभागों की सहमति के यह नीति कैबिनेट में नहीं जा सकती। इससे न केवल योजनाओं के क्रियान्वयन में देरी हो रही है, बल्कि गांवों में चल रही योजनाओं के रखरखाव में भी दिक्कतें आ रही हैं।
समस्या की जड़: मंत्री नहीं बैठे, नीति अटकी
प्रदेश सरकार द्वारा जल जीवन मिशन के तहत अब तक 27,990 एकल नल जल योजनाएं स्वीकृत की जा चुकी हैं।
इन योजनाओं के रखरखाव हेतु करीब 1,000 करोड़ रुपए वार्षिक खर्च अनुमानित है।
पीएचई विभाग ने इसकी मेंटेनेंस के लिए ऑपरेशन एंड मेंटेनेंस (O&M) नीति तैयार की है।
लेकिन पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के साथ मंत्रिस्तरीय स्तर पर बैठक न होने के कारण नीति अटकी हुई है।
बैठक में सहमति न बनने के कारण यह मामला कैबिनेट तक नहीं पहुंच पा रहा।
क्यों जरूरी है यह नीति ?
बिना ऑपरेशन और मेंटेनेंस नीति के योजनाओं की समय पर मरम्मत और संचालन संभव नहीं।
पीएचई और पंचायत विभाग के बीच यह तय होना जरूरी है कि कौन विभाग किस हिस्से की जिम्मेदारी उठाएगा।
नीति लागू नहीं होने से योजनाएं अधूरी रह जाती हैं, जिससे ग्रामीणों को पानी की समस्या झेलनी पड़ती है।
जल जीवन मिशन: एमपी की स्थिति एक नजर में
बिंदु आँकड़े :
योजनाओं में शामिल गाँव 51,000 से अधिक
प्रस्तावित घरों की संख्या 1 करोड़ 12 लाख
अब तक जुड़े घर 78 लाख
घरों में पानी की आपूर्ति 34 लाख
प्रमाणित जल वाले गाँव 2 गाँव
टारगेट: दिसंबर 2025 तक पूरा करना है कार्य
प्रदेश में 2025 तक 100% घरों में नल से जल पहुंचाने का लक्ष्य है।
वर्तमान में कुल घरों में से सिर्फ 30% घरों तक ही पानी पहुँच पाया है।
जल जीवन मिशन में केंद्र सरकार का लक्ष्य 2024 तक सभी घरों में जल पहुँचाने का था, लेकिन अब मध्यप्रदेश सरकार ने इसे 2025 तक खींच दिया है।
अधिकारियों की सफाई
पीएचई विभाग का कहना है कि नीति पूरी तरह तैयार है, बस अंतिम मंजूरी के लिए बैठक जरूरी है।
यदि जल्द बैठक नहीं हुई, तो 10 वर्षों की योजना के रखरखाव में गड़बड़ी होगी।
अधिकारियों ने बताया कि एक हजार करोड़ की यह राशि राज्य सरकार वहन करेगी, ऐसे में इसकी संरचना को लेकर स्पष्टता जरूरी है।
ग्राम पंचायतों की भूमिका भी तय नहीं
नीति में ग्राम पंचायतों की भूमिका क्या होगी, इस पर भी अभी सहमति नहीं बनी है।
पंचायत विभाग चाहता है कि ग्राम पंचायतें खुद O&M का संचालन करें, जबकि पीएचई चाहता है कि तकनीकी काम वही करें।
नीति अटकी तो क्या नुकसान?
योजनाओं की मरम्मत समय पर नहीं होगी।
ग्रामीणों को गंदा या बंद पानी मिलेगा।
सरकार की छवि खराब होगी और मिशन की डेडलाइन आगे बढ़ सकती है।
एक हजार करोड़ की राशि का सही उपयोग नहीं हो पाएगा।
कब होगी बैठक ?
अधिकारी उम्मीद कर रहे हैं कि जल्द मंत्रियों की बैठक होगी।
दोनों मंत्रियों की व्यस्तता के चलते 2 महीने से यह मीटिंग नहीं हो पाई है।
जब तक बैठक नहीं होती, नीति कैबिनेट में नहीं जाएगी और काम ठप ही रहेगा।
कटाक्ष के बोल:
“जल जीवन मिशन का पानी रुक गया, क्योंकि मंत्रीजी को समय नहीं मिला।”
“नीति कागज़ों पर बह रही है, गांवों में नल सूखे पड़े हैं।”
