शिवानी यादव। ढाका : एक समय था जब शेख हसीना बांग्लादेश की सत्ता की सबसे मज़बूत आवाज़ थीं। वर्षों तक शासन करने वाली, निर्णायक फैसलों और अपने कड़े रुख के लिए पहचानी जाने वाली यह नेता अब कानून के कठघरे में हैं।
बुधवार को बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने शेख हसीना को न्यायालय की अवमानना का दोषी ठहराते हुए छह महीने की कैद की सज़ा सुनाई। उनके साथ एक और व्यक्ति, शकिल अकंद बुलबुल को भी दो महीने की सज़ा दी गई है।
यह सज़ा उनकी गिरफ्तारी या आत्मसमर्पण के बाद से प्रभावी मानी जाएगी। न्यायाधीश मोहम्मद गोलाम मोर्तुजा मोज़ूमदार की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने यह फैसला सुनाया।
विवादास्पद कॉल ने बदल दी तस्वीर
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत हुई एक टेलीफोन कॉल से। यह कॉल एक वीडियो के रूप में सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी, जिसमें कथित तौर पर शेख हसीना कहती सुनी गईं:
मेरे खिलाफ 227 केस दर्ज हैं, तो क्या इसका मतलब है कि मुझे 227 लोगों को मारने का लाइसेंस मिल गया?
इस बयान को न्यायालय ने गंभीरता से लिया और इसे न्याय प्रक्रिया को धमकाने व प्रभावित करने की कोशिश माना।
सत्ता से सड़क तक –
शेख हसीना का राजनीतिक जीवन बांग्लादेश की सबसे लंबी प्रधानमंत्री बनने से लेकर, आज एक दोषी के रूप में कोर्ट में खड़े होने तक पहुंच चुका है।
साल 2024 में छात्रों द्वारा शुरू किया गया “कोटा आंदोलन” अचानक उग्र हो गया। सरकार द्वारा इसे दबाने के लिए कठोर कदम उठाए गए। हजारों प्रदर्शनकारी मारे गए, इंटरनेट बंद किया गया, और अनेक पत्रकारों को जेल में डाला गया।
इस घटना के कुछ ही सप्ताह बाद, भारी दबाव में आकर शेख हसीना ने इस्तीफा दे दिया और देश छोड़कर भारत चली गईं। तब से वह नई दिल्ली में रह रही हैं।
न्यायपालिका की सख्ती और जनता की उम्मीदें
यह फैसला बांग्लादेश के न्यायिक इतिहास में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह दर्शाता है कि अब बांग्लादेश में न्यायपालिका भी शक्तिशाली नेताओं के खिलाफ निष्पक्षता से कार्रवाई करने से नहीं हिचकती।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में पहले ही संकेत दिए जा चुके हैं कि हसीना के शासनकाल में मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन हुआ था, जिसे “मानवता के खिलाफ अपराध” की श्रेणी में रखा जा सकता है।
आगे क्या?
अब सबकी निगाहें इस पर हैं कि क्या हसीना भारत से स्वेच्छा से लौटकर न्यायालय के सामने आत्मसमर्पण करेंगी, या उन्हें प्रत्यर्पण की प्रक्रिया का सामना करना पड़ेगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा मोड़ ला सकता है।
शेख हसीना की कहानी एक ऐसे नेता की कहानी बन चुकी है, जो सत्ता की ऊंचाइयों से गिरकर अब कानून की कठोर सच्चाई से जूझ रही हैं।
