रोहित रजक, भोपाल। मध्यप्रदेश में जल गंगा संर्वधन के नाम पर सरकारी स्तर पर बड़े-बड़े दावे तो किए गए, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। प्रदेशभर में पिछले तीन महीने से नहरों और बांधों पर हुए अतिक्रमण को हटाने के लिए अभियान चलाया गया, लेकिन इस अभियान में अफसर पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं। अब तक न तो अतिक्रमण हट पाया और न ही संबंधित अधिकारियों की कोई जवाबदेही तय हो पाई है।
सरकार ने जल स्रोतों को साफ-सुथरा और अतिक्रमण मुक्त करने के लिए जल गंगा संर्वधन अभियान की शुरुआत की थी। इस अभियान के तहत बांधों, नहरों और जलाशयों के आसपास अवैध कब्जों को हटाना था, जिससे जल की आपूर्ति और संरक्षण में कोई बाधा न आए। लेकिन तीन महीने बीत जाने के बाद भी न तो कब्जे हटे और न ही कुछ ठोस कार्य हुआ। राज्य के जल संसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट ने अधिकारियों की लापरवाही पर नाराजगी जताई है।
उन्होंने साफ कहा है कि जो अधिकारी रिपोर्ट देने में हीलाहवाली कर रहे हैं या जो अतिक्रमण नहीं हटा पा रहे हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
रिपोर्ट में सामने आई हकीकत
प्रदेश के अलग-अलग जिलों से जो रिपोर्ट जल संसाधन विभाग को भेजी गई है, उसमें कई चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं। कुछ जिलों ने तो यह तक नहीं बताया कि उनके क्षेत्र में कितनी नहरें और बांध हैं। वहीं, जिन जिलों ने रिपोर्ट भेजी है, उनमें से ज्यादातर में अतिक्रमण की जानकारी तो दी गई, लेकिन यह नहीं बताया कि उसे हटाने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।
अतिक्रमण हटाने की जगह ली टालमटोल
कई जगहों पर तो अतिक्रमण को चिन्हित ही नहीं किया गया है। जिन जगहों पर कब्जे की जानकारी दी गई है, वहां भी कार्रवाई नहीं की गई। इससे साफ पता चलता है कि प्रशासनिक अमला इस अभियान को गंभीरता से नहीं ले रहा।

अफसरों को पहले ही दी गई थी चेतावनी
मंत्री सिलावट ने पहले ही निर्देश दिए थे कि नहरों और बांधों के आसपास अवैध निर्माण या अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने जल संसाधन विभाग के प्रमुख अभियंता को कहा था कि हर ज़िले से रिपोर्ट ली जाए और जिम्मेदार अफसरों की जवाबदेही तय की जाए। लेकिन आदेशों के बाद भी नतीजा शून्य ही रहा।
अब तय होगी अफसरों की जिम्मेदारी
मंत्री ने अब निर्देश दिए हैं कि जिन अधिकारियों ने समय पर रिपोर्ट नहीं दी या जिनके इलाके में अतिक्रमण हटाने की कार्यवाही नहीं हुई, उनकी जिम्मेदारी तय की जाए। विभागीय कार्रवाई की भी संभावना जताई जा रही है।
तकनीकी अमला भी फेल
जानकारों का कहना है कि जल संसाधन विभाग के तकनीकी अधिकारी और इंजीनियर भी इस काम को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। कुछ जिलों में तो सर्वे भी ठीक से नहीं हुआ है। इससे सरकार की मंशा पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
विकास कार्यों की फाइलें अटकीं
बताया जा रहा है कि नहरों और बांधों के किनारे अवैध कब्जों के कारण कई ज़रूरी विकास कार्य भी रुक गए हैं। ROB, फ्लाईओवर और कॉरिडोर जैसे निर्माण कार्यों की प्लानिंग अटकी हुई है। जब तक अतिक्रमण नहीं हटेगा, तब तक ये प्रोजेक्ट भी आगे नहीं बढ़ सकेंगे।
तीन महीने चले अभियान के बाद भी नहरों और बांधों पर हो रहे अवैध कब्जों को हटाने में प्रशासन पूरी तरह फेल नजर आया है। इस लापरवाही से न सिर्फ जल संरक्षण को नुकसान हो रहा है, बल्कि विकास कार्यों में भी बाधा आ रही है। अब देखना होगा कि सरकार किस हद तक जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई करती है या फिर यह अभियान भी केवल कागजों में सिमट कर रह जाएगा।

