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रोहित रजक पन्ना, मध्यप्रदेश।
पन्ना टाइगर रिजर्व की सबसे उम्रदराज और बेहद शांत स्वभाव वाली हथिनी ‘वत्सला’ का 8 जुलाई 2025 को निधन हो गया। बताया जा रहा है कि उसकी उम्र 100 साल से भी ज्यादा थी। वत्सला की मौत से वन विभाग और पर्यावरण प्रेमियों में गहरा शोक है। उसने जीवन का लंबा हिस्सा जंगलों की सेवा में बिताया।

केरल से नर्मदापुरम और फिर पन्ना तक का सफर

वत्सला का जीवन सफर खास रहा। वह पहले केरल में रही, जहां वह वन विभाग के कामों और धार्मिक आयोजनों में हिस्सा लिया करती थी। उम्र अधिक होने पर उसे नर्मदापुरम (पुराना नाम होशंगाबाद) लाया गया।

वहां कुछ साल बिताने के बाद, वर्ष 2001 में उसे पन्ना टाइगर रिजर्व भेजा गया।उस वक्त उसकी उम्र करीब 75 से 80 साल के बीच मानी गई थी। पन्ना आने के बाद वह पूरी तरह यहीं की होकर रह गई और वर्षों तक वन विभाग की सेवा में लगी रही।

एशिया की सबसे बुजुर्ग हथिनी

वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, वत्सला की उम्र 100 साल से अधिक थी, जिससे वह एशिया की सबसे बुजुर्ग हथिनी मानी जा रही थी।

आमतौर पर एशियाई हाथियों की औसत उम्र 60 से 70 साल मानी जाती है। ऐसे में उसका इस उम्र तक जीवित रहना वन विभाग की बेहतर देखरेख और सेवा का उदाहरण है।

बीमार चल रही थी, 8 जुलाई को शांत हुई

पिछले कुछ महीनों से वत्सला बीमार थी। वह चलने-फिरने में कमजोर हो गई थी और भोजन भी बहुत कम कर रही थी। उसकी देखरेख के लिए डॉक्टरों की विशेष टीम तैनात की गई थी।

उसे आराम, दवा और पोषणयुक्त आहार दिया जा रहा था। लेकिन उम्र का असर इतना गहरा था कि वह ठीक नहीं हो सकी और 8 जुलाई की सुबह उसने दम तोड़ दिया।

वत्सला का वन्य जीवन में योगदान

  1. जंगल की निगरानी में सहयोग – वत्सला वर्षों तक बाघों की निगरानी, जंगल की गश्त और ट्रैकिंग जैसे कार्यों में वन रक्षकों की साथी रही।
  2. पर्यटन में आकर्षण का केंद्र – शांत स्वभाव के कारण पर्यटक उसे देखना पसंद करते थे। वह रिजर्व की पहचान बन चुकी थी।
  3. अनुभव और समझदारी – वह अन्य हाथियों और कर्मचारियों को सहज रूप से समझती थी। वन विभाग के नए सदस्यों के लिए वह एक मार्गदर्शक की तरह थी।

वन विभाग ने जताया दुख

पन्ना टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर ने कहा –
“वत्सला हमारे लिए सिर्फ एक हथिनी नहीं थी, वह परिवार जैसी थी। वह वर्षों तक हमारी सबसे विश्वसनीय साथी रही। उसकी यादें हमेशा हमारे दिलों में रहेंगी।”

संरक्षण पर एक बार फिर सवाल

वत्सला की मौत ने एक बार फिर वन्यजीव संरक्षण के महत्व को सामने ला दिया है। देश के कई हिस्सों में हाथियों को आज भी कठिन परिस्थितियों में रखा जाता है। जंगल सिकुड़ते जा रहे हैं, जिससे इंसान और जानवरों के बीच संघर्ष बढ़ा है।
वत्सला की लंबी उम्र इस बात का प्रमाण है कि जब जानवरों की ठीक से देखभाल की जाती है, तो वे सम्मान और स्वास्थ्य के साथ जीवन जी सकते हैं।


वत्सला सिर्फ एक हथिनी नहीं थी, बल्कि जंगल की अनुभवी संरक्षक थी। उसका योगदान, उसकी समझदारी और सेवा की भावना, वन विभाग और समाज के लिए एक मिसाल है। भले ही आज वह हमारे बीच नहीं है, लेकिन उसकी कहानियां और उसके साथ बिताया समय हमेशा याद रहेगा।

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