ऋषिता गंंगराडें

भारत में मानसून को जीवन रेखा माना जाता है। कृषि आधारित हमारी अर्थव्यवस्था का अधिकांश भाग मानसून की बारिश पर निर्भर है। लेकिन वर्ष 2025 में मानसून की असामान्यता ने देश के कई हिस्सों को या तो सूखे की चपेट में डाल दिया है या भीषण बाढ़ का सामना करने पर मजबूर कर दिया है।

सूखे की मार

उत्तर भारत के कई हिस्सों, जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश, में जून-जुलाई में सामान्य से 40-50% कम बारिश हुई है। नतीजतन, खेती के लिए जरूरी जल स्रोत सूखने लगे हैं। कई जिलों में धान और गन्ने की बुआई नहीं हो पाई है, जिससे किसानों में चिंता का माहौल है।

मुख्य प्रभाव:

  • फसल की बुआई में देरी या रुकावट
  • ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट
  • मवेशियों के लिए चारे की कमी
  • ग्रामीण पलायन में वृद्धि

बाढ़ का कहर

दूसरी ओर, पूर्वोत्तर राज्यों (असम, मणिपुर, अरुणाचल), महाराष्ट्र के कोकण क्षेत्र, और गुजरात में अत्यधिक वर्षा ने बाढ़ जैसे हालात पैदा कर दिए हैं। नदी-नालों में उफान है, सड़कें टूट चुकी हैं और हज़ारों लोग राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं|

मुख्य प्रभाव:

  • लाखों लोगों का विस्थापन
  • फसल और संपत्ति को भारी नुकसान
  • स्वास्थ्य संकट: डेंगू, मलेरिया और जलजनित रोगों का फैलाव
  • स्कूल-कॉलेज बंद, यातायात बाधित

आंकड़े बताते हैं संकट की गहराई

  • जुलाई 2025 तक, IMD रिपोर्ट के अनुसार, देश का औसत वर्षा स्तर सामान्य से 20% कम रहा।
  • NDMA (राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण) के अनुसार, इस मानसून सीज़न में अब तक 70 से अधिक जिलों को बाढ़/सूखा प्रभावित घोषित किया गया है।

कारण क्या हैं?

  • जलवायु परिवर्तन: मौसम चक्र में असंतुलन, ग्लोबल वार्मिंग और बर्फीले क्षेत्रों के पिघलने से मानसून का पैटर्न बदल गया है।
  • वनों की कटाई और शहरीकरण: जलस्रोतों पर अत्यधिक दबाव और हरियाली में गिरावट से बारिश के प्रभाव बदल रहे हैं।
  • असंतुलित जल नीति: कुछ क्षेत्रों में जल प्रबंधन सही न होने के कारण संकट और गहरा जाता है।

क्या हो समाधान?

  1. जल संरक्षण को प्राथमिकता देना – वर्षा जल संचयन, छोटे बांध, और पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन
  2. कृषि में जल-संवेदनशील तकनीकों का प्रयोग
  3. बाढ़-सूखा पूर्व चेतावनी प्रणाली को मज़बूत करना
  4. स्थानीय समुदायों को प्रशिक्षण देना और जागरूकता फैलाना

मानसून की बेरुख़ी ने यह साफ कर दिया है कि प्रकृति से छेड़छाड़ का अंजाम हम सभी को भुगतना पड़ता है। अगर समय रहते हम सतर्क नहीं हुए, तो हर वर्ष बाढ़ और सूखा नई सामान्य स्थिति बन सकती है। यह समय है जब सरकार, वैज्ञानिक, किसान और आम जनता मिलकर जलवायु संतुलन और जल प्रबंधन की दिशा में ठोस कदम उठाएं।

स्रोत: भारत मौसम विभाग (IMD), NDMA, और विभिन्न समाचार रिपोर्ट्स

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *