रानू यादव: हिमाचल प्रदेश के सिरमौर ज़िले के शिलाई गांव में हाल ही में हुई एक शादी को लेकर काफ़ी चर्चा हो रहा है।कुंहाट गांव की सुनीता चौहान ने दो सगे भाइयों प्रदीप नेगी और कपिल नेगी से एक साथ शादी की है। यह शादी अनुसूचित जनजाति के हाटी समुदाय की पुरानी बहुपति प्रथा के तहत हुई है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘जोड़ीदारा’ या ‘जाजड़ा’ कहते है।
सिरमौर के ट्रांस गिरी इलाके़ में हुई इस शादी में काफी ग्रामीण और रिश्तेदार शामिल हुए।पारंपरिक व्यंजन, लोकगीत और नृत्य ने इस आयोजन को और यादगार बना दिया। जहां यह शादी एक सांस्कृतिक परंपरा का उदाहरण है, वही इसपर कई सवाल भी उठ रहे है।
जोड़ीदार प्रथा क्या होता है?
जोड़ीदार प्रथा, जिसे बहुपति प्रथा या द्रौपदी प्रथा भी कहा जाता है, एक ऐसी विवाह प्रथा है जिसमें एक महिला एक से अधिक पुरुषों से विवाह करती है। यह प्रथा मुख्य रूप से भारत के कुछ हिस्सों, जैसे हिमाचल प्रदेश के हाटी समुदाय, उत्तराखंड के कुछ क्षेत्रों और तिब्बत से सटे इलाकों में पाई जाती है।
जोड़ीदार प्रथा के पीछे का कारण:
एक महिला के कई पति: इसमें एक महिला अक्सर सगे भाइयों से शादी करती है।
संपत्ति का बंटवारा रोकना: यह प्रथा मुख्य रूप से परिवारों में भूमि और संपत्ति के बंटवारे को रोकने के लिए अपनाई जाती है। जब सभी भाई एक ही महिला से शादी करते हैं, तो संपत्ति का विभाजन नहीं होता और परिवार की एकता बनी रहती है।
संयुक्त परिवार की भावना: यह प्रथा संयुक्त परिवार की अवधारणा को मजबूत करती है, जहाँ सभी पति मिलकर बच्चों का पालन-पोषण करते हैं और घर के कामों में योगदान करते हैं।
स्थानीय मान्यता: कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में राजस्व कानून इस परंपरा को मान्यता देते हैं, हालांकि हिंदू विवाह अधिनियम आमतौर पर बहुविवाह को प्रतिबंधित करता है (जब तक कि अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष अधिसूचना न हो)।
बच्चों का पालन-पोषण: बच्चे अपने सभी पिताओं को अलग-अलग नामों से बुलाते हैं (जैसे ‘बड़ा बाप’, ‘मंझला बाप’, ‘छोटा बाप’), जो परिवार में भाईचारे और सहयोग की भावना को दर्शाता है।
महाभारत से जुड़ाव: कुछ लोग इस प्रथा को महाभारत काल की द्रौपदी की कहानी से जोड़कर देखते हैं, जिन्होंने पांच पांडवों से विवाह किया था।
यह प्रथा आज भी कुछ समुदायों में प्रचलित है, हालांकि समय के साथ इसमें बदलाव आ रहे हैं। इसका मुख्य उद्देश्य अक्सर आर्थिक और सामाजिक कारकों से जुड़ा होता है, जैसे संसाधनों का संरक्षण और परिवार की एकजुटता बनाए रखना। शादी के बाद सामाजिक और नैतिक बहस भी शुरू हो गया है। कुछ लोग इसे सहमति और व्यक्तिगत पसंद का मामला मानते हैं, जबकि कई संगठन इसे महिला अधिकारों के ख़िलाफ़ बताते है।
बीबीसी के एक रिपोर्ट में ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वीमेन्स एसोसिएशन की महासचिव मरियम धावले ने कहा, “यह प्रथा महिलाओं के शोषण को बढ़ावा देती है और उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।” वहीं हिमाचल प्रदेश सरकार के उद्योग मंत्री और शिलाई के विधायक हर्षवर्धन चौहान का कहना है, “यह शिलाई की पुरानी परंपरा है। प्रदीप और कपिल ने इस प्रथा को जीवित रखकर अपनी सांस्कृतिक विरासत को सम्मान दिया है।”
दोनों परिवार हाटी समुदाय से आते हैं। ये समुदाय मूल रूप से सिरमौर ज़िले के ट्रांस गिरी क्षेत्र के अलावा उत्तराखंड के जौनसार-बावर और रवाई-जौनपुर इलाक़ों में भी रहते है। इस समुदाय में बहुपति प्रथा लंबे समय से चल आ रहा है। इस प्रथा को जानने वाले लोग मानते हैं कि इस प्रथा का उद्देश्य परिवार के भीतर आपसी एकता बनाए रखना और संपत्ति के बंटवारे को रोकना है। यह परंपरा सिरमौर के अलावा शिमला, किन्नौर और लाहौल स्पीति के कुछ हिस्सों में भी देखने को मिलता है।
