रानू यादव: विश्व भर में बच्चों में मोबाइल देखने की लत बढ़ती जा रही है, जिसका बच्चों की सेहत पर बहुत ही बुरा असर देखने को मिल रहा है। जिस तरह बच्चे मोबाइल पर अपना समय बिता रहे हैं ऐसे बच्चों में खास तौर पर दिल से जुड़ी बीमारियां मोटापा, टाइप 2 डायबिटीज और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियों का खतरा ज्यादा होने की संभावना होती है।
बच्चों को मोबाइल फोन देखने से कई तरह के नुकसान हो सकते हैं, जो उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों पर बुरा प्रभाव डाल सकते है। आज कल पैरेंट्स अपने काम में व्यस्त होने की वजह से बच्चों को मोबाइल फोन दे देते है। जिससे बच्चों में चिड़चिड़ापन बढ़ता जा रहा है।
आइए जानते है मोबाइल फोन का ज्यादा इस्तेमाल करने वाले बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
आंखों की समस्या: लंबे समय तक मोबाइल देखने से आंखों पर बहुत दबाव पड़ता है। इससे आंखों में सूखापन, जलन, थकान और धुंधलापन हो सकता है। नीली रोशनी (blue light) के अधिक संपर्क में आने से बच्चों में निकट दृष्टिदोष (myopia) का खतरा बढ़ सकता है।
नींद की कमी: मोबाइल फोन से निकलने वाली नीली रोशनी मेलाटोनिन हार्मोन के उत्पादन को बाधित करती है, जो नींद को नियंत्रित करता है। इससे बच्चों को रात में सोने में दिक्कत हो सकती है, उनकी नींद की गुणवत्ता खराब हो सकती है और वे दिनभर चिड़चिड़े महसूस कर सकते हैं।
मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता: मोबाइल पर ज्यादा समय बिताने से बच्चे बाहर खेलने या शारीरिक गतिविधियों में कम हिस्सा लेते हैं। इससे वे सुस्त हो जाते हैं, जिससे मोटापे और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
खराब पोस्चर: मोबाइल देखते समय अक्सर बच्चे गलत तरीके से बैठते या लेटते हैं, जिससे गर्दन, पीठ और कंधों में दर्द हो सकता है। इसे “टेक्स्ट नेक” (text neck) भी कहते हैं।
विकिरण का जोखिम: मोबाइल फोन से निकलने वाले रेडियोफ्रीक्वेंसी (RF) विकिरण को लेकर चिंताएं हैं, खासकर बच्चों के लिए, क्योंकि उनका दिमाग और शरीर विकासशील अवस्था में होते हैं। हालांकि, इस पर अभी और शोध की आवश्यकता है, लेकिन सावधानी बरतना महत्वपूर्ण है।
मानसिक और विकासात्मक स्वास्थ्य पर असर
मानसिक विकास में बाधा: मोबाइल पर ज्यादा समय बिताने से बच्चों के संज्ञानात्मक (cognitive) विकास पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। उनकी रचनात्मकता, समस्या-समाधान कौशल और कल्पना शक्ति कम हो सकती है।
ध्यान और एकाग्रता में कमी: मोबाइल पर लगातार आने वाले नोटिफिकेशन और तेज़ी से बदलते कंटेंट के कारण बच्चों का ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम हो सकती है। उनका अटेंशन स्पैन छोटा हो सकता है, जिससे पढ़ाई और अन्य कार्यों में उन्हें दिक्कत आ सकती है।
शैक्षणिक प्रदर्शन पर असर: मोबाइल फोन की वजह से बच्चों का ध्यान पढ़ाई से भटक सकता है, जिससे उनके शैक्षणिक प्रदर्शन पर नकारात्मक असर पड़ता है।
साइबरबुलिंग और अनुचित सामग्री का जोखिम: बच्चे ऑनलाइन दुनिया में साइबरबुलिंग और अनुचित या हिंसक सामग्री के संपर्क में आ सकते हैं, जिसका उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
कुल मिलाकर, बच्चों को मोबाइल फोन देना आजकल आम हो गया है, लेकिन इसकी अधिकता उनके विकास के लिए हानिकारक हो सकती है। माता-पिता को स्क्रीन टाइम को सीमित करने और बच्चों को शारीरिक गतिविधियों, रचनात्मक खेल और सामाजिक मेलजोल में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।
बच्चों ने मोबाइल फोन देखने से नुकसान होने वाले आंकड़े?
बच्चों पर मोबाइल फोन के अत्यधिक इस्तेमाल से होने वाली दिक्कतों के आंकड़े चिंताजनक हैं। विभिन्न अध्ययनों और सर्वेक्षणों से सामने आए कुछ प्रमुख आंकड़े इस प्रकार हैं:
भारत में आंकड़े
मोबाइल की लत और माता-पिता का व्यवहार:
Vivo और Cybermedia Research (CMR) के एक अध्ययन के अनुसार, भारत में माता-पिता बच्चों के साथ बिताए गए समय की तुलना में तीन गुना अधिक समय स्मार्टफोन पर बिताते हैं। माता-पिता औसतन 7.7 घंटे प्रतिदिन अपने स्मार्टफोन पर बिताते हैं, जबकि बच्चों के साथ वे लगभग 2 घंटे बिताते हैं।
लगभग 75% माता-पिता बच्चों के साथ रहते हुए भी फोन का इस्तेमाल करते हैं।
91% बच्चों को अपने माता-पिता के अत्यधिक स्मार्टफोन इस्तेमाल के कारण अकेलापन महसूस होता है।
66% माता-पिता और 56% बच्चे अत्यधिक स्मार्टफोन उपयोग के कारण अपने व्यक्तिगत संबंधों में नकारात्मक बदलाव महसूस करते हैं।
73% माता-पिता और 69% बच्चे इस बात से सहमत हैं कि स्मार्टफोन का अत्यधिक उपयोग उनके बीच विवाद का कारण है।
64% बच्चे स्वीकार करते हैं कि वे अपने स्मार्टफोन के आदी हो चुके हैं।
मानसिक स्वास्थ्य पर असर:
एम्स भोपाल (AIIMS Bhopal) द्वारा 413 किशोरों (14 से 19 वर्ष) पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि:
24.9% किशोर चिंता (anxiety) से जूझ रहे थे। 56% में उतावलापन (impatience) देखा गया।59% को बार-बार गुस्सा आता था।
जर्नल ऑफ ह्यूमन डेवलपमेंट एंड कैपेबिलिटीज़ में प्रकाशित एक रिसर्च के अनुसार, 18 से 24 साल के उन युवाओं में आत्मघाती विचार, आक्रामकता, भावनात्मक अस्थिरता और कम आत्मसम्मान की शिकायतें ज़्यादा देखी गईं, जिन्हें 12 साल या उससे कम उम्र में पहला स्मार्टफोन मिला था। महिलाओं पर मोबाइल का नकारात्मक असर ज़्यादा देखा गया।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (NIMHANS), बेंगलुरु के एक अध्ययन में भारतीय किशोरों में चिंता और अवसाद (depression) के बढ़ते रुझान का संकेत मिला, जिसमें सोशल मीडिया के उपयोग को एक योगदान देने वाला कारक बताया गया है।
शारीरिक और विकासात्मक समस्याएं:
ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) के एक अध्ययन में बच्चों में निकट दृष्टिदोष (myopia) में उल्लेखनीय वृद्धि की सूचना दी गई है, जिसका संबंध अत्यधिक स्क्रीन टाइम से हो सकता है।
चोंनाम विश्वविद्यालय के शोध के अनुसार, 7 से 16 वर्ष के अधिकांश बच्चे जिन्होंने स्मार्टफोन में अधिक समय बिताया था, वे तिरछी नजर (cross-eye) वाले हो गए। चार घंटे से अधिक समय बिताने से क्रॉस आई होने की समस्या सबसे अधिक होती है।
अंतर्राष्ट्रीय आंकड़े और WHO की सलाह;
अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (AAP) 2 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए मीडिया के उपयोग को हतोत्साहित करती है और बड़े बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम को प्रतिदिन एक या दो घंटे से अधिक न रखने की सलाह देती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार:
2 साल से कम उम्र के बच्चों को बिल्कुल भी स्क्रीन टाइम नहीं देना चाहिए (वीडियो कॉल को छोड़कर)
2 से 5 साल तक के बच्चों के लिए प्रतिदिन 1 घंटे से अधिक स्क्रीन टाइम नहीं होना चाहिए।
एक अध्ययन में पाया गया कि जिन बच्चों ने प्रतिदिन 2 घंटे से अधिक स्क्रीन टाइम बिताया, उनमें ध्यान, भावनात्मक और सामाजिक समस्याएं होने की संभावना अधिक थी।
अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के अनुसार, जिन बच्चों के बेडरूम में टीवी या अन्य स्क्रीन होती हैं, वे उन बच्चों की तुलना में टेस्ट में खराब प्रदर्शन करते हैं जिनके बेडरूम में ये चीजें नहीं होतीं।
