रानू यादव
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) का चलन तेजी से बढ़ रहा है और इसी के साथ गली-मोहल्लों और चौराहों पर नए-नए EV चार्जिंग स्टेशन भी खुल रहे हैं। ये चार्जिंग स्टेशन न सिर्फ लोगों को उनके इलेक्ट्रिक वाहनों को चार्ज करने की सुविधा दे रहे हैं, बल्कि इनके मालिक भी अच्छी कमाई कर रहे हैं। आइए, जानते हैं कि EV चार्जिंग स्टेशनों की कमाई का क्या सिस्टम है।

कितने तरह के होते हैं चार्जिंग स्टेशन?
इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के लिए चार्जिंग स्टेशन कई तरह के होते हैं, जिन्हें मुख्य रूप से उनकी चार्जिंग गति और बिजली के प्रकार (AC या DC) के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। इन्हें आमतौर पर तीन मुख्य स्तरों में बांटा जाता है:

1. लेवल 1 (Level 1) चार्जिंग
यह सबसे धीमी चार्जिंग विधि है, जिसमें एक सामान्य घरेलू 120-वोल्ट AC आउटलेट (जैसा कि आप अपने घर में किसी भी उपकरण के लिए उपयोग करते हैं) का उपयोग किया जाता है। यह प्रति घंटे लगभग 3 से 7 किलोमीटर की रेंज जोड़ता है। एक पूरी तरह से खाली बैटरी को चार्ज करने में 24 घंटे या उससे भी ज्यादा का समय लग सकता है। यह ज्यादातर उन लोगों के लिए उपयुक्त है जो रात भर घर पर गाड़ी चार्ज करना चाहते हैं और जिनकी दैनिक यात्रा कम होती है। इसमें किसी विशेष उपकरण की आवश्यकता नहीं होती है। EV के साथ एक पोर्टेबल चार्जर आता है, जिसे सीधे घर के सॉकेट में लगाया जा सकता है।


2. लेवल 2 (Level 2) चार्जिंग
यह लेवल 1 की तुलना में बहुत तेज होती है और 240-वोल्ट AC बिजली का उपयोग करती है। इसके लिए एक समर्पित चार्जर स्टेशन या दीवार पर लगा हुआ चार्जिंग यूनिट (Wallbox) लगाना पड़ता है। यह प्रति घंटे लगभग 20 से 60 किलोमीटर की रेंज जोड़ती है। एक पूरी तरह से खाली बैटरी को 4 से 10 घंटे में चार्ज कर सकती है यह घर, ऑफिस, शॉपिंग मॉल, होटल और सार्वजनिक पार्किंग स्थलों में सबसे आम है। यह दैनिक उपयोग के लिए सबसे सुविधाजनक विकल्प है। यह लेवल 1 से काफी तेज है और ज्यादातर EVs के लिए उपयुक्त है। इसके लिए एक प्रोफेशनल इंस्टॉलेशन की आवश्यकता होती है।


3. लेवल 3 (Level 3) या DC फ़ास्ट चार्जिंग
यह सबसे तेज चार्जिंग विधि है, जिसे “DC फ़ास्ट चार्जिंग” या “रैपिड चार्जिंग” भी कहा जाता है। इसमें सीधे DC (डायरेक्ट करंट) बिजली का उपयोग होता है, जिससे बैटरी बहुत तेजी से चार्ज होती है। यह एक घंटे से भी कम समय में बैटरी को 80% तक चार्ज कर सकती है। कुछ अल्ट्रा-रैपिड चार्जर तो 20-30 मिनट में यह काम कर सकते हैं। यह मुख्य रूप से राजमार्गों, लंबी दूरी की यात्राओं और व्यावसायिक बेड़ों (Commercial fleets) के लिए लगाई जाती है, जहाँ चालक को जल्दी चार्जिंग की आवश्यकता होती है। यह चार्जिंग स्टेशन बहुत महंगे होते हैं और इनका पावर आउटपुट बहुत ज्यादा होता है। सभी EV मॉडल DC फ़ास्ट चार्जिंग को सपोर्ट नहीं करते हैं, इसलिए गाड़ी की compatibility देखना जरूरी होता है।

एसी और डीसी चार्जिंग का क्या रेट है?
एसी (AC) और डीसी (DC) चार्जिंग की दरें (rate) इस बात पर निर्भर करती हैं कि वे कितनी तेज़ी से बैटरी में बिजली पहुँचा सकती हैं, जिसे किलोवाट (kW) में मापा जाता है। डीसी चार्जिंग एसी चार्जिंग से बहुत तेज़ होती है क्योंकि यह सीधे कार की बैटरी को बिजली देती है, जबकि एसी चार्जिंग को पहले कार के अंदर एक कनवर्टर (converter) से गुज़रना पड़ता है।


एसी चार्जिंग (AC Charging)
एसी चार्जिंग को इलेक्ट्रिक वाहन (EV) चार्ज करने का सबसे आम और धीमा तरीका माना जाता है। यह अक्सर घर और काम की जगहों पर इस्तेमाल होता है। यह धीमी गति से चार्ज होता है क्योंकि इसमें बिजली को बैटरी में जाने से पहले कार के ऑनबोर्ड चार्जर द्वारा एसी से डीसी में बदला जाता है। इस प्रक्रिया में समय लगता है। इसका पावर आउटपुट 3.3 kW से 22 kW तक होता हैं।
उदाहरण: 7 kW के चार्जर से एक सामान्य इलेक्ट्रिक कार (लगभग 60 kWh की बैटरी वाली) को पूरी तरह चार्ज होने में 8 से 10 घंटे लग सकते हैं।
डीसी चार्जिंग (DC charging)
डीसी चार्जिंग को फ़ास्ट चार्जिंग या लेवल 3 चार्जिंग भी कहते हैं। यह एसी चार्जिंग से कई गुना तेज़ होती है क्योंकि इसमें बिजली सीधे डीसी के रूप में कार की बैटरी में जाती है। इसमें कनवर्टर चार्जिंग स्टेशन में ही लगा होता है, न कि कार में। इसलिए, यह तेज़ी से चार्ज करता है और लंबी यात्राओं के दौरान या जब आपको जल्दी चार्ज करना हो, तब इसका उपयोग होता है। 50 kW से 350 kW तक और कुछ मामलों में इससे भी ज़्यादा।
उदाहरण: 50 kW के डीसी चार्जर से एक सामान्य इलेक्ट्रिक कार (60 kWh की बैटरी वाली) 20 मिनट से 1 घंटे में 80% तक चार्ज हो सकती है।

फ़ायदा कैसे होता है?
आप जिस फ़ायदे की बात कर रहे हैं, वह शायद इस संदर्भ में है कि इलेक्ट्रिक वाहन (EV) को घर पर चार्ज करने से, पेट्रोल या डीज़ल से चलने वाली गाड़ी की तुलना में प्रति किलोमीटर लागत बहुत कम हो जाती है।
उदाहरण;इलेक्ट्रिक कार (EV): एक इलेक्ट्रिक कार को 1 किलोमीटर चलाने में लगभग 0.15 से 0.20 यूनिट बिजली लगती है। अगर हम प्रति यूनिट बिजली की औसत लागत ₹7 मान लें, तो 1 किलोमीटर का ख़र्च लगभग ₹1.05 से ₹1.40 होगा।
पेट्रोल कार: एक सामान्य पेट्रोल कार को 1 किलोमीटर चलाने में औसतन ₹8 से ₹10 या उससे भी ज़्यादा का ख़र्च आता है (पेट्रोल की मौजूदा कीमतों के हिसाब से)।
इस हिसाब से, इलेक्ट्रिक वाहन को घर पर चार्ज करके आप प्रति यूनिट (या प्रति किलोमीटर) काफ़ी बचत कर सकते हैं, जो आपकी कुल यात्रा लागत को बहुत कम कर देता है।

अलग अलग जगहों पर चार्जिंग रेट बदल जाता है?
चार्जिंग रेट अलग-अलग जगहों पर बदल जाता है। घर पर चार्ज करना सबसे सस्ता होता है क्योंकि इसमें आपके घर की सामान्य बिजली दर (tariff) लगती है। सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन, जैसे मॉल या हाईवे पर, ज़्यादा महंगे होते हैं क्योंकि ऑपरेटर अपने खर्च (जैसे रखरखाव, ज़मीन का किराया, और बिजली की लागत) भी जोड़ते हैं। एसी (AC) स्लो चार्जिंग की दरें डीसी (DC) फ़ास्ट चार्जिंग की दरों से कम होती हैं। फ़ास्ट चार्जर लगाने और चलाने में ज़्यादा लागत आती है, इसलिए वे प्रति यूनिट (kWh) ज़्यादा शुल्क लेते हैं।भारत में हर राज्य की अपनी बिजली दरें और नीतियाँ हैं। इसके अलावा, विभिन्न चार्जिंग नेटवर्क ऑपरेटर (जैसे टाटा पावर, रिलायंस बीपी) भी अपने रेट खुद तय करते हैं।इसलिए, अपनी गाड़ी चार्ज करने से पहले, यह जाँच करना हमेशा बेहतर होता है कि आप किस तरह के चार्जर और किस जगह का इस्तेमाल कर रहे हैं।

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