काजल जाटव। मिजोरम, उत्तर-पूर्व भारत का एक सीमावर्ती राज्य, फिर से काफी संख्या में म्यांमार से शरणार्थियों का स्वागत कर रहा है। इसकी वजह है म्यांमार में चल रहा आंतरिक संघर्ष, जो अब गुटों के बीच झगड़े का रूप ले चुका है। इस बार करीब 1000 से ज्यादा लोग मिजोरम पहुँचे हैं, जिनमें महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग सभी शामिल हैं।
इसके पीछे कारण क्या है?
म्यांमार में सेना के खिलाफ लड़ रहे कई हथियारबंद गुट हैं, लेकिन अब इनके बीच भी वर्चस्व की जंग शुरू हो गई है। खासतौर पर चिन राज्य के हाकाहा और थांजाल जिलों में, जहां चिनलैंड डिफेंस फोर्स (CDF) और बाकी हथियारबंद संगठनों के बीच तेज लड़ाई हो रही है। इन झगड़ों की वजह से आम लोग अपने घर और गांव छोड़कर सीमा पार मिजोरम में शरण ले रहे हैं।
शरणार्थियों को सुविधाएं
मिजोरम की सरकार और स्थानीय प्रशासन के मुताबिक, ये शरणार्थी मुख्य तौर पर चंफाई और सेरछिप जिलों के सीमा वाले गांवों में आए हैं। इन्हें अभी अस्थायी कैंपों में रखा गया है, जहां उन्हें खाने-पीने का इंतजाम, नल का पानी और मेडिकल सुविधाएं मिल रही हैं। मिजोरम के लोग पहले से ही म्यांमार के लोगों के साथ सांस्कृतिक और जातीय तौर पर जुड़े हुए हैं, इसलिए यहां की आम जनता भी इन शरणार्थियों की मदद में आगे आ रही है।
मिजोरम की भावनात्मक अपील और दिल्ली की नीति
भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, 2021 के बाद जब से म्यांमार में सैन्य तख्तापलट हुआ, तब से लगभग 50,000 से ज्यादा म्यांमार के लोग मिजोरम और मणिपुर में शरण ले चुके हैं। इस नए संकट ने राज्य सरकार के सामने मानवीय और प्रशासनिक दोनों तरह की चुनौतियों को खड़ा कर दिया है।
हालांकि, केंद्र सरकार ने इन सीमा पार शरणार्थियों को स्वीकार न करने का निर्देश दिया था, मगर मिजोरम की सरकार ने मानवीय आधार पर इन लोगों को राहत देना जारी रखा है। मुख्यमंत्री जोरमथांगा पहले भी कह चुके हैं कि, “हम अपने ही लोगों को उनके हाल पर छोड़ नहीं सकते। वे चाहे म्यांमार में रहते हों, पर हमारी जड़ें तो एक हैं।”
इस संकट ने फिर से भारत की पूर्वोत्तर सीमा की सुरक्षा, मानवाधिकार और विदेशी नीति को लेकर सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल ये है कि क्या भारत इन शरणार्थियों को स्थायी तौर पर शरण देगा? म्यांमार की स्थिति कब सुधरेगी? और इन लोगों की पढ़ाई, सेहत और सुरक्षा का जिम्मा कौन लेगा? ये सब ऐसे सवाल हैं, जो अभी जवाब की तलाश में हैं।
