रानू यादव
फ़तेहपुर के अबूनगर में नवाब अब्दुस समद के मक़बरे को लेकर एक विवाद खड़ा हो गया है। हिंदू संगठनों का दावा है कि यह एक मंदिर था, जिसे बाद में मक़बरे में बदल दिया गया। इस दावे के समर्थन में वे मक़बरे के अंदर कुछ मूर्तियों और हिंदू स्थापत्य कला के अवशेषों का हवाला दे रहे हैं। और कुछ लोग 11 अगस्त को मकबरे में घुसकर और तोड़फोड़ की इन संगठनों का दावा है कि इस मकबरे के भीतर हिंदू देवी देवताओं के निशान है। पुलिस की मौजूदगी के बावजूद हिंदू संगठन के लोग बैरिकेड तोड़कर परिसर में घुस गए थे।
हालांकि बाद में फतेहपुर के जिलाधिकारी रविंद्र सिंह ने कहा है कि अब हालात सामान्य है। पुलिस ने 10 ज्ञात और डेढ़ सौ अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है। एसपी अनूप कुमार सिंह का कहना है कि ऐसी हिंसा फैलाने वालों की पहचान की जा रही है।
कहां पर स्थित है यह मकबरा?
कानपुर प्रयागराज जीटी रोड पर फतेहपुर जिला है। गंगा जमुना के बीच के दो आज क्षेत्र में स्थित फतेहपुर जिला मुख्यालय के कोतवाली इलाके में अबू नगर है। यह मकबरा इसी इलाके में स्थित है। इसके गुंबदों की हालत बेहद ही खराब है। जिला गजेटियर ( भौगौलिक निर्देशिका)का कहना है कि नवाब अब्दुल समद औरंगजेब के दौर में पैलानी बुंदेलखंड के फौजदार थे। उन्हें बड़ी जागीरें प्राप्त थी। उन्होंने उत्तर में किला और टैंक बनवाए लेकिन रहने के लिए फतेहपुर रखा।
आखिर पांच सौ साल मकबरे को लेकर विवाद क्यों?
फ़तेहपुर के अबूनगर में स्थित नवाब अब्दुस समद का मक़बरा एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक इमारत है। फ़तेहपुर के गजेटियर के अनुसार, शहर में इस मक़बरे के अलावा कोई और ऐतिहासिक इमारत नहीं है। यह मक़बरा उनके पुराने किले के बगल में बना हुआ है।
मक़बरे और अबूनगर का इतिहास:
गजेटियर में बताया गया है कि अबू नगर का नाम नवाब अब्दुस समद के बड़े बेटे अबू मोहम्मद के नाम पर रखा गया था। मक़बरे पर मौजूद शिलालेख के अनुसार, नवाब अब्दुस समद की मृत्यु 1699 ईस्वी में हुई थी, जबकि उनके बेटे अबू मोहम्मद की मृत्यु 1704 ईस्वी में हुई थी। यह शिलालेख इन दोनों महत्वपूर्ण व्यक्तियों की मृत्यु की सही तारीख़ें बताता है।
मक़बरे की बनावट!
गजेटियर में मक़बरे के डिज़ाइन का वर्णन करते हुए कहा गया है कि यह एक “भारी, अव्यवस्थित संरचना” है। इसकी सबसे खास बात यह है कि इसके चारों कोनों पर एक-एक गुंबद है, जिनकी ऊँचाई केंद्रीय गुंबद के लगभग बराबर है। यह वास्तुकला की एक असामान्य शैली है जो इसे अन्य मकबरों से अलग करती है।
यह जानकारी बताती है कि यह मक़बरा न केवल एक ऐतिहासिक स्थल है, बल्कि इसकी वास्तुकला भी अनूठी है, जो इसे और भी महत्वपूर्ण बनाती है।
कैसे शुरू हुआ विवाद?
फ़तेहपुर में नवाब अब्दुस समद के मक़बरे को लेकर विवाद की शुरुआत तब हुई जब हिंदू संगठनों से जुड़े कुछ लोग 11 अगस्त को मक़बरे में घुस गए और वहाँ पूजा करने की कोशिश की। जिसने बीजेपी का भी समर्थन था।इन संगठनों का दावा है कि यह इमारत असल में एक मंदिर थी, जिसे बाद में मक़बरे में बदल दिया गया।
इस घटना के बाद स्थिति तनावपूर्ण हो गई और मक़बरे के कुछ हिस्सों में तोड़फोड़ भी हुई। हिंदू संगठनों ने दावा किया कि मक़बरे की दीवारों और गुंबदों पर फूल और त्रिशूल जैसी आकृतियाँ बनी हैं, जो यह साबित करती हैं कि यह पहले एक मंदिर था। इसके अलावा, उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि वहाँ एक शिवलिंग और नंदी की मूर्ति भी मौजूद थी, जिन्हें बाद में हटा दिया गया।
इस घटना ने तुरंत ही राजनीतिक रंग ले लिया, और यह मामला उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी उठाया गया। पुलिस ने तोड़फोड़ और हिंसा के आरोप में कई लोगों के खिलाफ़ प्राथमिकी (FIR) दर्ज की है। इस विवाद के बाद से प्रशासन ने इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी है और स्थिति को नियंत्रण में रखने की कोशिश कर रहा है।
बीजेपी के जिला अध्यक्ष मुखलाल पाल इस मामले में अब लोगों से शांति की अपील कर रहे हैं। हालांकि पहले वह खुद इस अभियान में शामिल थे। उन्होंने पहले चेतावनी दी थी, 11 अगस्त 2025 को मकवारे के भीतर मौजूद शिव मंदिर की पूजा अर्चना करने वाले हैं। उन्होंने आम लोगों से भी वहां पहुंचने की अपील की थी। इसके बाद ही हिंदू संगठन के कार्यकर्ता सोमवार को मंदिरों में इकट्ठा हुए और हंगामा शुरू किया।
फतेहपुर में मठ मंदिर संरक्षण संघर्ष समिति ने मकबरे में मंदिर होने का दावा किया है। विवाद का एक और पहलू ज़मीन से जुड़ा हुआ है। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह ज़मीन पहले एक हिंदू परिवार के पास थी और बाद में इसे बेचा गया, जिसके बाद इस पर प्लॉटिंग भी की गई। इस तरह, यह विवाद न केवल धार्मिक दावों पर आधारित है, बल्कि इसमें ज़मीन से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं।
राजनीतिक विवाद?
फ़तेहपुर में नवाब अब्दुस समद के मक़बरे को लेकर शुरू हुआ विवाद अब एक राजनीतिक मुद्दा बन गया है, जहाँ विभिन्न राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं। यह विवाद उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी गूंजा, जहाँ विपक्षी दलों ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए।
विपक्ष के आरोप:
समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता और विपक्ष के नेता माता प्रसाद पांडे ने विधानसभा में यह मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि एक राजनीतिक पार्टी के नेता इस ऐतिहासिक मक़बरे पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं और सरकार इस पर कोई कार्रवाई नहीं कर रही है।
सपा ने आरोप लगाया है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार जानबूझकर राज्य में सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने की कोशिश कर रही है। उनका कहना है कि इस घटना को रोकने के लिए सरकार ने समय रहते कोई कदम नहीं उठाया।
जब संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ने विधानसभा में इस मामले में दर्ज एफआईआर में नामजद आरोपियों के नाम पढ़ने की कोशिश की, तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन्हें रोक दिया। विपक्ष ने इस पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि सरकार दंगों में शामिल लोगों को बचा रही है और उनके नाम सार्वजनिक नहीं करना चाहती।
सत्ता पक्ष का बचाव:
संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ने आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि सरकार का इस घटना से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने बताया कि इस मामले में 10 नामजद और 150 अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है।
सुरेश खन्ना ने सदन में कहा कि जो भी कानून को अपने हाथ में लेगा, उसे न्यायिक प्रक्रिया के तहत सजा मिलेगी। सरकार किसी भी व्यक्ति को नहीं बख्शेगी, चाहे वह किसी भी पार्टी से जुड़ा हो। भाजपा ने विपक्षी दलों पर इस मामले का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि विपक्ष प्रदेश का माहौल खराब करके राजनीतिक लाभ लेना चाहता है।
एफआईआर में भाजपा, बजरंग दल और समाजवादी पार्टी से जुड़े कुछ लोगों के नाम भी शामिल हैं, जिससे मामला और भी उलझ गया है।इस घटना के बाद समाजवादी पार्टी ने अपने एक नेता पप्पू सिंह चौहान को पार्टी से निष्कासित कर दिया है, जिनका नाम एफआईआर में था।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा आरोपियों के नाम पढ़ने से रोकने के वीडियो के वायरल होने के बाद, यह मुद्दा सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफॉर्म पर भी चर्चा का विषय बन गया है। कुल मिलाकर, फ़तेहपुर का यह मक़बरा विवाद अब धार्मिक और ऐतिहासिक दावे से बढ़कर एक राजनीतिक लड़ाई बन गया है, जिसमें सभी दल एक-दूसरे पर निशाना साध रहे हैं।
