अनंत चतुर्दशी का पर्व गणेश उत्सव का अंतिम दिन होता है। इस दिन भक्तगण हर्षोल्लास के साथ गणपति बप्पा का विसर्जन करते हैं। पारंपरिक रूप से यह विसर्जन नदियों, तालाबों और समुद्र में किया जाता रहा है। लेकिन हर वर्ष बड़ी संख्या में मूर्तियों के विसर्जन से जल प्रदूषण बढ़ता है और जलीय जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ऐसे में 2025 में समाज और सरकार दोनों स्तरों पर पर्यावरण के अनुकूल गणेश विसर्जन को बढ़ावा देने की पहल की जा रही है।
पर्यावरण पर असर
प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) और रासायनिक रंगों से बनी मूर्तियां पानी में घुलती नहीं हैं। इनसे जल स्रोत प्रदूषित होते हैं और मछलियों व अन्य जलीय जीवों की मृत्यु होती है। इसके अलावा, प्लास्टिक सजावट और थर्माकोल का उपयोग भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है।
पर्यावरण के अनुकूल विकल्प
इस बार कई राज्यों में मिट्टी और शुद्ध प्राकृतिक रंगों से बनी मूर्तियों के उपयोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है। कुछ स्थानों पर “बीज गणेश” मूर्तियां भी लोकप्रिय हो रही हैं, जिन्हें विसर्जन के बाद मिट्टी में रखने से पौधे उगते हैं। इसके अलावा, कृत्रिम टैंक और अस्थायी कुंड बनाकर विसर्जन करने की व्यवस्था की जा रही है, जिससे नदियों और झीलों पर दबाव कम हो।
सरकारी और सामाजिक पहल
नगर निगम और प्रशासन की ओर से इस वर्ष कई बड़े शहरों में कृत्रिम विसर्जन कुंड बनाए जाएंगे। साथ ही, सोशल मीडिया और जनजागरूकता अभियानों के जरिए लोगों को पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया जा रहा है। कई स्वयंसेवी संगठन और युवा समूह पर्यावरण-मित्र मूर्तियों को अपनाने और उनके प्रचार-प्रसार में सक्रिय हैं।
भविष्य के लिए संदेश
अनंत चतुर्दशी केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं है, बल्कि यह प्रकृति से संतुलन बनाए रखने का भी अवसर है। यदि हर भक्त यह संकल्प ले कि वह केवल पर्यावरण के अनुकूल मूर्तियों और सामग्री का ही उपयोग करेगा, तो आने वाले वर्षों में हम गणेश उत्सव को और भी स्वच्छ और हरित बना सकते हैं।
अनंत चतुर्दशी 2025, हमें यह याद दिलाती है कि भगवान गणेश ज्ञान और विवेक के देवता हैं। सच्ची श्रद्धा यही है कि हम उनकी पूजा के साथ-साथ पर्यावरण की रक्षा का भी संकल्प लें। पर्यावरण के अनुकूल विसर्जन न केवल प्रकृति को सुरक्षित रखेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक स्वच्छ और स्वस्थ जीवन सुनिश्चित करेगा।
