Muskan Garg: केरल हाई कोर्ट में जस्टिस कौसर एडप्पागत की बेंच ने एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल इस आधार पर पत्नी को गुज़ारा भत्ता से वंचित नहीं किया जा सकता कि वह किसी अस्थायी नौकरी में काम कर रही है। यदि उसकी आय जीवन-यापन के लिए पर्याप्त नहीं है, तो पति पर कानूनी रूप से भरण-पोषण देने की जिम्मेदारी बनी रहेगी।

केरल हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय:
हाई कोर्ट ने कहा कि एक महिला का कुछ समय के लिए काम करना या कम वेतन वाली नौकरी करना यह नहीं साबित करता कि वह अपने जीवन-यापन के लिए पूरी तरह सक्षम है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अस्थायी आय स्थायी सुरक्षा नहीं देती, और यदि पत्नी की आय न्यूनतम आवश्यकताओं को भी पूरा नहीं कर पाती, तो वह अपने पति से भरण-पोषण की हकदार है। यह निर्णय एक मामले में हुआ था, जिसमें पत्नी ने कहा था कि उसका पति उसे खर्चों से बचाने के लिए कहता था कि वह काम करती है, इसलिए उसे मेंटेनेंस की आवश्यकता नहीं है।

अदालत ने कहा: पति का दायित्व जीवनभर बना रहता है:
केरल हाई कोर्ट ने कहा कि शादी के बाद पति को पत्नी की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करना कानूनी और नैतिक दायित्व है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि पत्नी की नौकरी सिर्फ अस्थायी, कम वेतन वाली या अनिश्चित है, तो उसे आर्थिक रूप से ‘स्वावलंबी’ नहीं मानना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि “स्थायी नौकरी पत्नी की पति पर आर्थिक निर्भरता नहीं खत्म करती।”

महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा की दिशा में मजबूत कदम:
यह फैसला महिलाओं के अधिकारों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है। कई बार देखा गया है कि पत्नी मामूली नौकरी करके भी गुज़ारा भत्ता से वंचित कर दी जाती है। यह निर्णय ऐसे मामलों में स्पष्ट दिशा प्रदान करता है कि कानून पत्नी की आर्थिक सुरक्षा को भी सर्वोपरि मानता है। अदालत ने कहा कि मेंटेनेंस का उद्देश्य पत्नी को सम्मानजनक जीवन प्रदान करना है, न कि उसे संघर्षपूर्ण स्थिति में छोड़ देना।

इस मामले पर कानूनी विशेषज्ञों की राय:
कानून विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय से हजारों महिलाओं को राहत मिलेगी जो कम वेतन वाली नौकरियों पर निर्भर हैं। अब पति यह नहीं कह सकेगा कि पत्नी काम करती है कमाती है, इसलिए उसे पैसे नहीं देना चाहिए।

केरल हाई कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि पत्नी की छोटी या अस्थायी आय उसके भरण-पोषण के अधिकार को समाप्त नहीं करती। यह निर्णय न केवल न्यायसंगत है, बल्कि समाज में महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने की दिशा में एक मजबूत कदम भी है।

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