Baljinder Kaur: थैंक्सगिविंग डे अमेरिका और कनाडा का एक प्रमुख त्योहार है, जो आज पूरी दुनिया में पहचाना जाता है। यह दिन परिवार, आभार, प्रेम और एकता का प्रतीक बन चुका है। लोग अपने परिवार के साथ मिलकर भोजन का आनंद लेते हैं और बीते वर्ष की खुशियों के लिए भगवान का धन्यवाद करते हैं। भारत में भले ही यह त्योहार ज़्यादा नहीं मनाया जाता, लेकिन इसके पीछे की कहानी और इसे मनाने की परंपरा काफी दिलचस्प है।

थैंक्सगिविंग डे कब शुरू हुआ?
थैंक्सगिविंग की शुरुआत 1621 में हुई, जब अमेरिका के ‘पिलग्रिम’ बसने वालों और ‘वाम्पानोआग’ मूल निवासियों ने अपनी पहली सफल फसल का उत्सव मनाया। उन्होंने स्थानीय मूल निवासियों (Wampanoag Tribe) को भी आमंत्रित किया। यहीं से यह परंपरा शुरू हुई कि अच्छी फसल के लिए भगवान का शुक्रिया अदा किया जाए।
तारीख तय नहीं थी। राज्यों के हिसाब से यह दिन बदलता रहता था। इस वजह से पूरे देश में एकसमान उत्सव नहीं हो पाता था। धीरे-धीरे यह त्योहार अमेरिकी संस्कृति का हिस्सा बन गया और अलग-अलग राज्यों में इसे अलग-अलग दिनों पर मनाया जाने लगा।

अब्राहम लिंकन ने तय किया दिन
1863 में अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने गृहयुद्ध के समय देश को एकजुट रखने के लिए थैंक्सगिविंग को राष्ट्रीय त्योहार घोषित किया। उन्होंने इसे नवंबर के अंतिम Thursday को मनाने का निर्णय लिया। कई वर्षों तक यह परंपरा चली और पूरा देश इसी दिन थैंक्सगिविंग मनाता रहा। इससे पूरे देश में एक समान तारीख तय हो गई, और यह दिन राष्ट्रीय एकजुटता का प्रतीक बन गया।

चौथा गुरुवार क्यों?

समस्या तब आई जब कभी-कभी नवंबर का पाँचवाँ गुरुवार भी पड़ जाता था। उस समय के राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट ने इसमें बदलाव किया। उनका मानना था कि अगर त्योहार थोड़ा पहले मनाया जाए तो क्रिसमस शॉपिंग का समय बढ़ सकता है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को फायदा होगा।
इसलिए उन्होंने आखिरी Thursday की जगह नवंबर के चौथे Thursday को थैंक्सगिविंग डे निर्धारित कर दिया। यह बदलाव 1941 में अमेरिकी कांग्रेस ने भी आधिकारिक रूप से मंजूर कर दिया।

थैंक्सगिविंग डे सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि परिवार और एकजुटता का प्रतीक है। इसे हर साल नवंबर के चौथे Thursday को मनाने के पीछे इतिहास, परंपराएँ और आर्थिक कारण जुड़े हुए हैं।
थैंक्सगिविंग की कहानी हमें यह सिखाती है कि जीवन में छोटी-छोटी खुशियों और उपलब्धियों के लिए आभार व्यक्त करना कितना जरूरी है।

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