बाजार में रौनक तो लौटी, पर बढ़ती कीमतों ने आम उपभोक्ता की जेब पर डाला दबाव
भारत में त्योहारों का मौसम आर्थिक दृष्टि से सबसे सक्रिय समय माना जाता है। दीपावली, नवरात्रि, दशहरा और छठ जैसे पर्वों के दौरान खरीदारी का उत्साह अपने चरम पर रहता है। कपड़ों से लेकर गहनों तक, मिठाइयों से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स तक—हर क्षेत्र में बिक्री में उछाल आता है। बाजारों में भीड़ और सजावट इस बात का संकेत हैं कि लोगों में उत्सव का जोश है, परंतु इस बार महंगाई ने इस रौनक को थोड़ा फीका कर दिया है।
बढ़ती महंगाई और उपभोक्ता की चिंता
त्योहारों के दौरान मांग तो बढ़ी है, लेकिन खाद्य वस्तुओं और आवश्यक सामानों की कीमतों में बढ़ोतरी ने आम आदमी के बजट को बिगाड़ दिया है। प्याज, टमाटर, दालें और तेल जैसे रोजमर्रा के उत्पादों के दाम 10–15% तक बढ़ गए हैं। मिठाइयों के दाम में भी बढ़ोतरी देखने को मिली है क्योंकि दूध, घी और चीनी की लागत में इज़ाफ़ा हुआ है। इस कारण, उपभोक्ता अब सोच-समझकर खरीदारी कर रहा है और सुख-सुविधा की वस्तुओं से अधिक ज़रूरी चीजों पर ध्यान दे रहा है।
ऑनलाइन सेल और डिजिटल भुगतान का बढ़ता चलन
इस महंगाई के दौर में राहत की एक किरण ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स और ई-कॉमर्स सेल्स बनकर सामने आई हैं। “फेस्टिव ऑफर्स” और “कैशबैक स्कीम्स” के चलते उपभोक्ताओं की एक बड़ी संख्या अब ऑनलाइन खरीदारी की ओर झुक रही है। इससे डिजिटल भुगतान जैसे यूपीआई, वॉलेट और कार्ड ट्रांजैक्शन में भी तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है।
अर्थव्यवस्था पर असर
विशेषज्ञों का कहना है कि त्योहारों के मौसम में उपभोक्ता खर्च बढ़ने से घरेलू अर्थव्यवस्था को अस्थायी गति मिलती है। इससे रोजगार और उत्पादन में थोड़ी बढ़ोतरी होती है। परंतु लगातार बढ़ती महंगाई उपभोक्ताओं की खरीदने की क्षमता को कमजोर कर सकती है, जिससे भविष्य में मांग में गिरावट की आशंका बनी रहती है।
त्योहारों की खुशियाँ बरकरार हैं, पर उपभोक्ता अब “स्मार्ट स्पेंडिंग” की राह पर चल पड़ा है। महंगाई ने जहाँ जेब पर असर डाला है, वहीं बदलते खरीदारी रुझान और डिजिटल भुगतान के विस्तार ने भारतीय उपभोक्ता के व्यवहार को एक नई दिशा दी है।
स्रोत: भारतीय रिज़र्व बैंक के उपभोक्ता सर्वेक्षण, खुदरा व्यापार संघ की रिपोर्टें, और स्वतंत्र बाजार विश्लेषण पर आधारित।
