Ranu Yadav: बता दें कि बेसिक शिक्षा विभाग ने जून में एक आदेश जारी किया था कि गर्मी की छुट्टियों के बाद जब 1 जुलाई को स्कूल खुलेंगे तो जहां पर 50 से कम बच्चों की छात्र संख्या है, उन्हें मर्जर कर आसपास के स्कूलों में भेज दिया जाएगा।
जिसकी वजह से करीब 5000 प्राइमरी स्कूल बंद हो जाएगा इसका मतलब जिस स्कूल में 50 से कम छात्र है उसे दूसरे स्कूल में शिफ्ट कर दिया जाएगा। जिसका सीधा असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ेगा। सरकार के इस फैसले से अभिभावकों की टेंशन बढ़ गई है।
जब मामला कोर्ट में पहुंचा?
सरकार के इसी फैसले के खिलाफ सीतापुर की छात्रा कृष्णा कुमारी समेत 51 बच्चों ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।2 जुलाई को इस संबंध में याचिका दायर करते हुए याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि यह आदेश अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम का उल्लंघन करता है। यह कदम बच्चों की पढ़ाई में बाधा डालेगा, इससे समाज में असमानता पैदा होगी ।इस मामले पर जस्टिस पंकज भाटिया की कोर्ट में तीन व चार जुलाई को सुनवाई हुई, जिसमें दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं ने बहस किया था।
जिसने याचिकाकर्ताओं के वकील भी कहा कि सरकारी ऑर्डर कहता है कि 1 किलोमीटर के दायरे में स्कूल होने से शिक्षा का दायरा बढ़ेगा लेकिन सरकार के इस फैसले से सर्व शिक्षा नीति प्रभावित हो सकती है बच्चों के लिए स्कूल दूर हो जाएगा इसलिए इस फैसले को रद्द कर देना चाहिए।
जिस पर सरकारी अधिवक्ता ने कहा कि फैसला नियम के अनुसार लिया गया है। इन सब मामलों में कोर्ट का कहना है कि छात्र हितों को प्राथमिकता पर रखा जाना चाहिए यह कहते हुए जस्टिस पंकज ने फैसला सुरक्षित रख लिया।
इस फैसले को लेकर कांग्रेस ने विरोध प्रदर्शन किया। प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के साथ अमेठी जिलाध्यक्ष प्रदीप सिंघल के नेतृत्व में सैंकड़ों कार्यकर्ता कलेक्ट्रेट पहुंच गए और एसडीएम को राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा।
जिलाध्यक्ष प्रदीप सिंघल ने कहा कि स्कूलों के मर्ज करने से दूर – दराज के गांव के बच्चों को शिक्षा के लिए दूसरे गांव जाना पड़ेगा। इससे बच्चों और अभिभावकों को परेशानी होगी। साथ ही बीएड-बीटीसी की डिग्री वाले युवाओं को रोजगार में भी दिक्कत आएगी।
जिसने केवल लखनऊ में 445 और सुल्तानपुर जिले में 444 स्कूल सामने आए हैं जिनमें 50 से कम छात्र पढ़ाई करते हैं।
उत्तर प्रदेश में परिषदीय स्कूलों की संख्या 1 लाख 32 हजार है। जिनमें प्राथमिक स्कूल 85,000 और उच्च प्राथमिक स्कूल 45,625 हैं। इनमें करीब 1 करोड़ 49 लाख छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं।
यूपी सरकार की प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों की विलय की योजना शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 का खुला उल्लंघन करना होगा। जिसमें धारा-6 के तहत स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि न्यूनतम 300 की आबादी में और 1 किमी के दायरे में प्राथमिक विद्यालय स्थापित होगा। यह संविधान के अनुच्छेद 21 ए के तहत शिक्षा के मौलिक अधिकार का तथा नीति निदेशक तत्व के अनुच्छेद 46 का भी स्पष्ट खुला उल्लंघन है जो अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देने पर बल देता
लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार तर्क दे रही है कि ये कदम जनता की भलाई के लिए उठाया जा रहा है, शिक्षा की बेहतरी के लिए उठाया जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 और राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की रूपरेखा (एनसीएफ) 2020 के तहत स्कूलों के बीच सहयोग, समन्वय और संसाधनों के साझा उपयोग को बढ़ावा देना जरूरी है।
अगर स्कूलों का विलय हुआ तो जाहिर है कि स्कूल दूर होने की वजह से इसका असर हजारों छात्रों की शिक्षा पर तो पड़ेगा ही साथ ही शिक्षकों के हजारों पद भी कम हो जाएंगे और भविष्य में शिक्षकों की होने वाली भर्ती पर भी इसका असर पड़ेगा। इसके साथ ही इन स्कूलों में मिड डे मील बनाने वाली हजारों रसोइयों की नौकरी भी सीधे समाप्त हो जाएगी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद के पक्ष में सुनाया फैसला, 50 से कम बच्चे वाले स्कूल को मर्ज किया जाएगा , हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि, बच्चों के हित में है यह नीति ।
