काजल जाटव। भारत एक बहुत बड़ा और विविधताओं से भरा देश है, जहां आध्यात्मिकता और भक्ति का गहरा स्थान है। इस देश में सैकड़ों संत, बाबा और धर्मगुरु हैं जिनके पास न सिर्फ करोड़ों अनुयायी है, जिनकी आस्था इनसे जुड़ी हुई हैं बल्कि हजारों करोड़ की संपत्ति भी है जो बाबाओं को उनके अनुयायियों से ही प्राप्त हुई है। हाल ही में भारत के प्रमुख बाबाओं और संतों की संपत्तियों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। इन बाबाओं की संपत्ति लाखों में नहीं, करोड़ों में गिनी जाती है।

दूसरी तरफ, भारत सरकार का कुल ऋण 2025 की शुरुआत तक लगभग 170 लाख करोड़ रुपए से ऊपर पहुंच चुका है। सवाल यह उठता है कि अगर इन धार्मिक संस्थानों की संपत्तियों पर टैक्स लगाया जाए, या उनका एक छोटा हिस्सा भी देश के विकास के काम में लगाया जाता है? और यदि नहीं तो क्या इससे भारत का कुल कर्ज थोड़ा भी कम हो सकता है?

संपत्ति बनाम कर्ज: एक तुलनात्मक नजर

नीचे कुछ बाबाओं की सूची है जो यह दर्शाती है कि किसके पास आखिर कितनी संपत्ति है।

  • जय गुरु देव: 12,000 करोड़ रुपए
  • निरंकारी बाबा: 10,000 करोड़ रुपए
  • नित्यानंद स्वामी: 10,000 करोड़ रुपए
  • राम रहीम: 6,000 करोड़ रुपए
  • निर्मल बाबा: 5,000 करोड़ रुपए
  • राधा स्वामी जी महाराज: 3,000 करोड़ रुपए
  • मोरारी बापू: 3,000 करोड़ रुपए
  • आसाराम: 2,300 करोड़ रुपए
  • रामदेव बाबा: 1,600 करोड़ रुपए
  • अमृतानंदमयी देवी: 1,500 करोड़ रुपए
  • श्री श्री रविशंकर: 1,000 करोड़ रुपए
  • धीरेन्द्र शास्त्री: 900 करोड़ रुपए
  • साध्वी ऋतम्भरा: 500 करोड़ रुपए
  • राम पाल बाबा: 300 करोड़ रुपए
  • राधे माँ: 200 करोड़ रुपए
  • प्रदीप मिश्रा: 191.6 करोड़ रुपए
  • साकार विश्व हरि: 100 करोड़ रुपए
  • सतपाल महाराज: 75 करोड़ रुपए
  • देवकी नंदन: 30 करोड़ रुपए

यदि हम उपरोक्त सूची में उल्लिखित 20 प्रमुख बाबाओं की कुल संपत्ति का कुल योग करें, तो यह लगभग 74,735 करोड़ रुपये के आसपास पहुंचता है। यह राशि भारत के कुल कर्ज का करीब 4 से 5 प्रतिशत हिस्सा बनती है। यदि इनमें से केवल 10 प्रतिशत हिस्सा भी स्वेच्छा से देश की मदद के लिए दे दिया जाए, तो इसकी रकम लगभग 7,400 करोड़ रुपये बनती है। इससे हमारे देश में कई स्कूल, अस्पताल और सड़कें बनाई जा सकती हैं। 

क्या इन पर टैक्स लगता है?

भारत में धार्मिक संस्थान या ट्रस्ट सामान्यतः धारा 12A और 80G के तहत कर मुक़दमों से छूट का लाभ प्राप्त करते हैं। इसका अर्थ है कि यदि कोई संस्था ‘धार्मिक या चैरिटेबल’ उद्देश्य से पंजीकृत है, तो उसे अपनी आय पर कर नहीं देना पड़ता। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब इन संस्थानों के पास भव्य प्रॉपर्टियां, निजी जेट, लक्ज़री कारें और लग्जरी होटल जैसी सुविधाएं हैं, तो क्या वाकई में ये बस आध्यात्मिक सेवा की ही कीमत निभा रहे हैं? ऐसे मामले में, सरकार को चाहिए कि वह “धार्मिक आय” और “व्यावसायिक आय” के बीच एक स्पष्ट दूरी तय करे क्योंकि देखा जाए तो यह भी आय का ही एक माध्यम है, जिससे भारत देश के तमाम बाबा अपना जीवनयापन अमीरी के साथ कर रहे हैं।

नैतिक जिम्मेदारी बनाम कानूनी बाध्यता

ये बाबा लाखों लोगों की श्रद्धा का केंद्र हैं। उनका प्रभाव इतना प्रबल है कि वे कभी-कभी चुनावों जैसी महत्वपूर्ण बातों को भी प्रभावित कर देते हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या यह उनकी नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे देश के निर्माण में भी अपना योगदान निभाएं? अगर सरकार उनके संगठनों का सही तरीके से लेखा-जोखा मांगे, जैसे आय कहां से कितनी हो रही है, ट्रस्ट की ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक करे, तो इससे न केवल कर प्रणाली मजबूत होगी बल्कि लोगों का भरोसा भी बढ़ेगा। 

भारत का राष्ट्रीय ऋण अब भयावह स्तर पर पहुंच चुका है, और सरकार कई बार करों में इजाफा कर जनता से पैसा वसूलने का प्रयास कर रही है। दूसरी तरफ, कुछ धर्मगुरु और बाबा लोग करोड़ों की संपत्ति पर कर छूट का फायदा उठाकर अपनी संपदा बढ़ा रहे हैं। यह लेख किसी की धार्मिक श्रद्धा या आस्था को चोट पहुंचाने की मंशा नहीं रखता है, बल्कि यह  एक विचार है — क्या अब समय नहीं आ गया है जब आध्यात्मिक मार्गदर्शक भी आर्थिक जिम्मेदारी में अपनी भागीदारी निभाएं? कर्ज कम करने का जिम्मा सिर्फ सरकार या देश के लोगों का ही नहीं है, बल्कि हर प्रभावशाली संसाधन वर्ग को भी अपना हिस्सा निभाना चाहिए।

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