रानू यादव :15 अगस्त आजादी का अमृत महोत्सव, वीरों को याद करने का पावन अवसर है। 15 अगस्त, सिर्फ एक राष्ट्रीय पर्व नहीं, बल्कि उन अनगिनत वीरों और शहीदों को श्रद्धा सुमन अर्पित करने का दिन है, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर हमें आजादी का अमूल्य उपहार दिया। इस पावन अवसर पर, पूरा देश एक साथ होकर अपने उन वीर सपूतों को याद करता है, जिनके बलिदान की बदौलत आज हम एक स्वतंत्र राष्ट्र में सांस ले रहे हैं। स्वतंत्रता दिवस के इस पावन अवसर पर, हम भारत के महान क्रांतिकारी भगत सिंह को याद कर रहे हैं। उनका जीवन और विचार हमें आज भी प्रेरित करते हैं।जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने जान न्योछावर कर दिए।

भगत सिंह कौन थे?
भगत सिंह एक महान भारतीय क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी थे। वे ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष में एक प्रमुख व्यक्ति थे। उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र प्रतिरोध में सक्रिय रूप से भाग लिया और “इंकलाब जिंदाबाद” का नारा बुलंद किया। उन्हें 23 मार्च, 1931 को राजगुरु और सुखदेव के साथ फांसी दी गई थी।
भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को पंजाब के लायलपुर जिले (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। उनके पैतृक गांव खटकड़ कलां में है जो पंजाब भारत में है। उनके जन्म के समय उनके पिता किशन सिंह, चाचा अजीत और स्वर्ण सिंह जेल में थे। उन्हें 1906 में लागू किए हुए औपनिवेशीकरण विधायक के खिलाफ प्रदर्शन करने के जुल्म में जेल में डाल दिया गया था। उनकी माता का नाम विद्यावती था। भगत सिंह का परिवार एक आर्य समाज सिख परिवार था। वे एक प्रभावशाली क्रांतिकारी थे, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

भगत सिंह के क्रांतिकारी कार्य?
भगत सिंह ने भारत की आजादी के लिए कई क्रांतिकारी कार्य किए। उनके प्रमुख कार्य केवल हिंसा तक सीमित नहीं थे, बल्कि उनका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार को जगाना और जनता में क्रांति की भावना जगाना था। उनके कुछ प्रमुख क्रांतिकारी कार्य;
1. नौजवान भारत सभा की स्थापना:
1926 में, भगत सिंह ने नौजवान भारत सभा की स्थापना की। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य युवाओं को एकजुट करना, उनमें देशभक्ति की भावना भरना और ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष के लिए तैयार करना था। यह संगठन किसानों और मजदूरों को भी क्रांति के लिए प्रेरित करता था।


2. जॉन सॉन्डर्स की हत्या:
1928 में, ब्रिटिश पुलिस ने लाला लाजपत राय पर लाठीचार्ज किया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना का बदला लेने के लिए, भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने मिलकर पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या कर दी। वे गलती से जेम्स स्कॉट को मारना चाहते थे, जो लाठीचार्ज का जिम्मेदार था। यह घटना लाहौर षड्यंत्र केस का हिस्सा बनी।


3. केंद्रीय विधानसभा में बम फेंकना:
8 अप्रैल, 1929 को, भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की केंद्रीय विधानसभा में बम फेंका। इस बम का मकसद किसी को नुकसान पहुँचाना नहीं था, बल्कि बहरी ब्रिटिश सरकार को जगाना था। उन्होंने बम फेंकने के बाद खुद को गिरफ्तार होने दिया, ताकि उन्हें अदालत में अपने विचारों को सार्वजनिक रूप से रखने का मौका मिले। इस दौरान, उन्होंने “इंकलाब जिंदाबाद” का नारा दिया, जो भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण नारा बन गया।


4. जेल में भूख हड़ताल:
जेल में रहते हुए, भगत सिंह ने भारतीय और ब्रिटिश कैदियों के साथ होने वाले भेदभाव के खिलाफ लंबी भूख हड़ताल की। उनकी इस भूख हड़ताल ने पूरे देश का ध्यान खींचा और उन्हें एक लोक नायक बना दिया।
इन क्रांतिकारी कार्यों के माध्यम से, भगत सिंह ने न केवल ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष किया, बल्कि एक समाजवादी और न्यायपूर्ण समाज का भी सपना देखा।
आप इस वीडियो में भगत सिंह के जीवन और क्रांतिकारी कार्यों के बारे में अधिक जानकारी देख सकते हैं।

भगत सिंह के कुछ प्रसिद्ध उद्धरण?
इंकलाब जिंदाबाद:
यह नारा भगत सिंह का सबसे प्रसिद्ध नारा था। इसका अर्थ है “क्रांति अमर रहे”। यह नारा न केवल भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बना, बल्कि आज भी लोगों को क्रांति और बदलाव के लिए प्रेरित करता है।
1. जिन्दा रहने की हसरत मेरी भी है, पर मैं कैद रहकर अपना जीवन नहीं बिताना चाहता। – भगत सिंह

2. मरकर भी मेरे दिल से वतन की उल्फत नहीं निकलेगी, मेरी मिट्टी से भी वतन की ही खुशबू आएगी। – भगत सिंह

3. राख का हर एक कण मेरी गर्मी से गतिमान है। मैं एक ऐसा पागल हूं जो जेल में भी आजाद है। – भगत सिंह

4. वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन वे मेरे विचारों को नहीं मार सकते। वे मेरे शरीर को कुचल सकते हैं, लेकिन वे मेरी आत्मा को कुचलने में सक्षम नहीं होंगे। – भगत सिंह
5. इस कदर वाकिफ है मेरी कलम मेरे जज़्बातों से, अगर मैं इश्क़ लिखना भी चाहूँ तो इंकलाब लिखा जाता है। – भगत सिंह

6. जिंदगी तो अपने दम पर ही जी जाती है, दुसरों के कंधे पर तो सिर्फ जनाजे उठाए जाते हैं। – भगत सिंह

7. मेरे जीवन का केवल एक ही लक्ष्य है और वो है देश की आज़ादी. इसके अलावा कोई और लक्ष्य मुझे लुभा नहीं सकता – भगत सिंह
8. प्रेमी, पागल और कवि एक ही चीज से बने होते हैं। – भगत सिंह

9. आलोचना और स्वतंत्र सोच एक क्रांतिकारी के दो अनिवार्य गुण हैं। – भगत सिंह

10. मैं एक मानव हूँ और जो कुछ भी मानवता को प्रभावित करता है उससे मुझे मतलब है। – भगत सिंह

11. सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है। – भगत सिंह
12. राख का हर एक कण, मेरी गर्मी से गतिमान है। मैं एक ऐसा पागल हूँ जो जेल में भी आजाद है।”

सभा मामले की सुनवाई, जेल की सजा और फांसी?
भगत सिंह को लाहौर षड्यंत्र केस में फांसी दी गई थी, न कि असेंबली बम फेंकने के मामले में। हालांकि, लाहौर षड्यंत्र केस में सॉन्डर्स की हत्या के लिए उन्हें और उनके साथियों को दोषी ठहराया गया था, जबकि असेंबली में बम फेंकने के लिए उन्हें पहले आजीवन कारावास की सजा मिली थी।
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु पर लाहौर षड्यंत्र केस के तहत मुकदमा चलाया गया था। यह मामला 1928 में ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जे.पी. सॉन्डर्स की हत्या से संबंधित था।
भगत सिंह के मामले की सुनवाई करने वाले जजों ने 450 गवाहों को सुने बिना ही फांसी की सजा सुना दी थी। उनके वकीलों को जिरह करने का मौका भी नहीं दिया गया।7 अक्टूबर 1930 को, एक विशेष ट्रिब्यूनल ने 68 पृष्ठों का निर्णय दिया, जिसमें भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई गई। एक भारतीय न्यायाधीश, जस्टिस आगा हैदर ने इस फैसले पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दी गई थी। उनकी फांसी की तय तारीख 24 मार्च 1931 थी, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने जनता के संभावित आक्रोश से डरकर उन्हें 11 घंटे पहले ही फांसी दे दी थी। उनकी शहादत को याद करते हुए हर साल 23 मार्च को “शहीद दिवस” मनाया जाता है।

भगत सिंह की अंतिम इच्छा क्या थी?
उनकी अंतिम इच्छाओं में से एक यह थी कि वह फांसी से पहले एक क्रांतिकारी की जीवनी पढ़ना चाहते थे। जब उन्हें फांसी का समय बताया गया, तो वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। उन्होंने कहा था, “ठहरिए! पहले एक क्रांतिकारी दूसरे से मिल तो ले।”
इसके अलावा, कुछ लोगों का यह भी मानना है कि उनकी अंतिम इच्छा जेल के सफाईकर्मी, जिसे वे “बेबे” कहते थे, के हाथों से बना खाना खाने की थी। लेकिन यह इच्छा अधूरी रह गई क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने उन्हें तय समय से 12 घंटे पहले ही फांसी दे दी थी।

15 अगस्त का दिन हमें यह याद दिलाता है कि आजादी एक अनमोल विरासत है, जिसकी रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है। यह हमें एकजुट होकर देश की एकता, अखंडता और समृद्धि के लिए काम करने की प्रेरणा देता है। यह दिन देशभक्ति की भावना को फिर से जगाने और एक बेहतर, न्यायपूर्ण और समानतावादी भारत के निर्माण का संकल्प लेने का अवसर है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *