रिपोर्ट, काजल जाटव: भारत और अफगानिस्तान के बीच संबंधों को मजबूत करने के उद्देश्य से तालिबान सरकार के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी 9 और 10 अक्टूबर को भारत दौरे पर रहेंगे।

यह दौरा कई कारणों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है—एक तरफ अफगानिस्तान में तालिबान शासन को अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिली है, वहीं दूसरी ओर भारत इस अस्थिर पड़ोसी देश के साथ व्यवहारिक संबंध बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। मुत्ताकी का यह दौरा भारत और अफगानिस्तान के बीच कूटनीतिक संवाद की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

कौन हैं आमिर खान मुत्ताकी?

आमिर खान मुत्ताकी तालिबान सरकार के वर्तमान विदेश मंत्री हैं और तालिबान के वरिष्ठ नेताओं में से एक और कमांडर रह चुके हैं। वे तालिबान आंदोलन के शुरुआती दिनों से जुड़े हुए हैं और 1990 के दशक में भी तालिबान शासन के दौरान शिक्षा मंत्री और संस्कृति मंत्री रह चुके हैं। मुत्ताकी तालिबान की ‘कतर राजनीतिक कार्यालय’ के सदस्य रहे हैं, जो अमेरिका और अन्य देशों के साथ बातचीत के लिए जिम्मेदार था।

उनकी छवि एक व्यावहारिक और कूटनीतिक नेता के रूप में देखी जाती है, जो तालिबान के कठोर विचारों के बीच भी संवाद की राह निकालने की कोशिश करते हैं। मुत्ताकी को तालिबान के भीतर ‘मध्यमार्गी चेहरा’ माना जाता है, जो अंतरराष्ट्रीय समुदाय से बातचीत के पक्षधर हैं ताकि अफगानिस्तान को आर्थिक सहायता और मान्यता मिल सके।

संयुक्त राष्ट्र ने उन पर प्रतिबंध क्यों लगाया था?

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) ने 2001 में तालिबान शासन के पतन के बाद तालिबान के कई नेताओं पर यात्रा प्रतिबंध, संपत्ति फ्रीज और हथियारों पर रोक जैसी सख्त कार्रवाई की थी। इसका उद्देश्य था कि अफगानिस्तान में आतंकवाद और हिंसा को बढ़ावा देने वाले नेताओं पर दबाव बनाया जा सके।

आमिर खान मुत्ताकी का नाम भी उन्हीं प्रतिबंधित तालिबान नेताओं की सूची में शामिल था। इस कारण से वे किसी भी देश में बिना संयुक्त राष्ट्र की अनुमति के यात्रा नहीं कर सकते थे।

हालांकि, कुछ अवसरों पर संयुक्त राष्ट्र ‘ट्रैवल एक्सेम्प्शन (Travel Exemption)’ की अनुमति देता है ताकि तालिबान प्रतिनिधि अंतरराष्ट्रीय संवाद या शांति वार्ता में भाग ले सकें। अगस्त 2024 में मुत्ताकी का भारत दौरा इसी छूट पर निर्भर था, लेकिन उस समय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से अनुमति नहीं मिल पाई, जिसके चलते उनका दौरा रद्द करना पड़ा। अब, नई स्थिति में उन्हें यात्रा की मंजूरी मिल चुकी है, जिसके बाद वे भारत आ रहे हैं।

भारत-तालिबान संबंधों की जटिल पृष्ठभूमि

भारत ने कभी भी आधिकारिक रूप से तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है, लेकिन अफगानिस्तान के लोगों के साथ ऐतिहासिक और मानवीय संबंधों को ध्यान में रखते हुए भारत लगातार वहां मानवीय सहायता, खाद्यान्न और दवाइयों की आपूर्ति करता रहा है।

2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद भारत ने अपनी दूतावास सेवाएं बंद कर दी थीं, लेकिन 2022 में काबुल में भारतीय तकनीकी दल भेजकर सीमित राजनयिक उपस्थिति बहाल की गई। यह संकेत था कि भारत तालिबान के साथ संवाद पूरी तरह खत्म नहीं करना चाहता।

क्या है भारत की चिंता?

भारत की मुख्य चिंता अफगानिस्तान की जमीन का पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठनों द्वारा इस्तेमाल न किया जाना है। तालिबान से संवाद का एक प्रमुख उद्देश्य यह सुनिश्चित करना भी है कि अफगानिस्तान से भारत विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा न मिले।

पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच डुरंड लाइन को लेकर लड़ाई बढ़ गई है। यह सीमा रेखा ब्रिटिश शासन में 1893 में खींची गई थी। पाकिस्तान इसे अपनी सीमा मानता है। अफगानिस्तान इससे सहमत नहीं है।

पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) जैसे अपराधी ग्रुप को पनाह दे रहा है। ये ग्रुप पाकिस्तान में हमला करते हैं। हाल ही में पाकिस्तान ने सीमा पार से हवाई हमला किया। तालिबान ने इसका विरोध किया। इस वजह से इलाके में चिंता बढ़ गई है।

भारत के लिए मुत्ताकी की यात्रा का मतलब

आमिर खान मुत्ताकी का भारत आना सिर्फ दो देशों के बीच संबंध नहीं है। यह क्षेत्र की राजनीति का भी हिस्सा है। भारत के लिए यह मौका है कि वह—

  • अफगानिस्तान में अपने राजनीतिक और मानवीय काम को मजबूत करे।
  • यह सुनिश्चित करे कि पाकिस्तान या चीन का असर नहीं बढ़े।
  • अफगानिस्तान की सुरक्षा और वहां के हिंदू-सिख जैसे समुदाय की मदद पर चर्चा करे।

इसके अलावा, भारत अफगानिस्तान में इन्फ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे प्रोजेक्ट से अपनी अच्छी छवि बना सकता है। आमिर खान मुत्ताकी का भारत आना साउथ एशिया की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है। भारत दोनों पक्षों से बात न भी करे, लेकिन बातचीत शुरू करना जरूरी है।

भारत के लिए, अफगानिस्तान सिर्फ पास का देश नहीं बल्कि उससे जुड़ने का रास्ता है। इस तरह, मुत्ताकी की यात्रा से पता चलता है कि बदलाव के इस दौर में भारत बातचीत और स्थिरता के लिए काम कर रहा है। ऐसी उम्मीद है कि भारत और अफगानिस्तान के बीच भरोसा बढ़ेगा। इससे दोनों देशों को सुरक्षा, स्थिरता, और तरक्की में मदद मिलेगी।

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